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20 वर्षों से जारी आस्था का अद्भुत दृश्य, हर 31 दिसंबर को स्वयं हिलता है भगवान पार्श्वनाथ का छत्र: इंदौर के नवग्रह जिनालय में रात 11:30 बजे से 1 बजे तक साक्षात दिखाई देता है अतिशय, हजारों श्रद्धालु बनते हैं साक्षी


इंदौर के ग्रेटर बाबा क्षेत्र स्थित नवग्रह जिनालय में पिछले 20 वर्षों से हर 31 दिसंबर की रात भगवान पार्श्वनाथ का छत्र स्वयं हिलता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास को और मजबूत करता है। संपादक रेखा संजय जैन की विशेष रिपोर्ट


इंदौर। ग्रेटर बाबा क्षेत्र स्थित दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र नवग्रह जिनालय बीते 20 वर्षों से आस्था, विश्वास और चमत्कार नहीं बल्कि अतिशय का जीवंत केंद्र बना हुआ है। यहां प्रतिवर्ष 31 दिसंबर की रात लगभग 11:30 बजे से भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा पर विराजित छत्र अपने आप हिलने लगते हैं। यह दृश्य करीब रात 1 बजे तक चलता है, जिसे हजारों श्रद्धालु अपनी आंखों से देखते हैं।

हर साल एक ही रात, एक ही समय

आश्चर्य की बात यह है कि यह अतिशय हर वर्ष एक ही तिथि और लगभग एक ही समय पर होता है। न हवा, न कंपन—फिर भी छत्र का स्वतः हिलना श्रद्धालुओं के मन में रोमांच और भक्ति दोनों भर देता है।

सफेद नाग-नागिन से जुड़ा है अतिशय का इतिहास

रेखा जैन के अनुसार प्रारंभिक 15 वर्षों तक इस अतिशय के दौरान सफेद नाग-नागिन के दर्शन भी होते रहे। आज भी मंदिर परिसर में सफेद नाग द्वारा छोड़ी गई काचली सुरक्षित रखी गई है, जिसे श्रद्धालु इस अतिशय का सजीव प्रमाण मानते हैं।

प्रतिष्ठा महोत्सव में दिखे अलौकिक दृश्य

मंदिर के प्रतिष्ठा महोत्सव के समय और उसके बाद कई अद्भुत घटनाएं सामने आईं—

एक बच्चे के ऊपर से सफेद सर्प का निकल जाना

रात्रि में भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के गले में सर्प का लिपटा रहना

भोजन की नुक्ति पर सर्प का बैठना

लगभग 50 हजार श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण के बावजूद नुक्ति की मात्रा में कमी न होना

इन घटनाओं ने श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा कर दिया।

1998 में आधारशिला, 2005 में पंचकल्याणक

नवग्रह जिनालय की आधारशिला 1 फरवरी 1998 को रखी गई थी। 10 से 17 फरवरी 2005 के बीच भव्य पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न हुआ। इसके बाद आचार्य दर्शन सागर जी के सानिध्य में पहली बार भगवान के छत्र को हिलते हुए देखा गया, जो आज तक निरंतर जारी है।

निर्माण में त्याग और समर्पण की मिसाल

मंदिर के निर्वाणकर्ता नरेंद्र शकुन्तला वेद बताते हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता स्व. बाबूलाल जी एवं माता गिरनी बाई से चर्चा के बाद लगभग 20 हजार वर्गफुट भूमि मंदिर निर्माण के लिए दान दी। आर्थिक संकट आने पर उन्होंने अपना प्रतिष्ठान 18 लाख रुपये में बेचकर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया।

कैसी है मंदिर की संरचना

नवग्रह जिनालय के निचले तल में पद्मासन में विराजमान मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ हैं, जहां छत्र हिलने का अतिशय होता है। ऊपरी मंजिल पर 24 तीर्थंकरों की खडगासन प्रतिमाएं स्थापित हैं।

चमत्कार नहीं, देवों की भक्ति का अतिशय

अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का कहना है कि इसे चमत्कार कहना उचित नहीं है। यह देवगणों की भक्ति का परिणाम है, जिससे आज भी श्रावकों को यह अनुभूति होती है कि भगवान की उपस्थिति सजीव है।

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