दिगंबर जैन मंदिर बड़वानी में विराजित परम पूज्य उत्कृष्ट समाधि धारक राष्ट्र संत गणाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज के शिष्य उपाध्याय श्री विभंजन सागर जी मुनिराज ने आज धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रावकों को पूजा, क्रिया और भावों की शुद्धता पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। पढ़िए दीपक प्रधान की रिपोर्ट
बड़वानी। दिगंबर जैन मंदिर बड़वानी में विराजित परम पूज्य उत्कृष्ट समाधि धारक राष्ट्र संत गणाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज के शिष्य उपाध्याय श्री विभंजन सागर जी मुनिराज ने आज धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रावकों को पूजा, क्रिया और भावों की शुद्धता पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।
दैनिक क्रियाओं में होने वाली सूक्ष्म त्रुटियों पर प्रकाश
मुनि श्री ने अपने प्रवचन में अनेक बारीक एवं छोटी-छोटी बातों को समझाते हुए बताया कि श्रावक अपनी दैनिक दिनचर्या में अनजाने में कई त्रुटियां कर बैठते हैं, जिसके कारण उन्हें अपेक्षित धार्मिक परिणाम प्राप्त नहीं होते। उन्होंने कहा कि अपनी प्रत्येक क्रिया में विनय और विशुद्धि लाना आवश्यक है।
आगम सम्मत विधि अपनाने का आह्वान
उपाध्याय श्री ने कहा कि आगम में निहित विधि एवं क्रियाओं को अपनाना चाहिए, न कि केवल परंपराओं या रूढ़िवादी तरीकों का अनुसरण कर अपनी धार्मिक क्रियाएं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन बातों को जीवन में उतारना अत्यंत आवश्यक है।
अभिषेक विधि पर विशेष उदाहरण
मुनि श्री ने बताया कि कई श्रावक भगवान के अभिषेक के समय एक हाथ से कलश पकड़ते हैं और दूसरा हाथ कोहनी पर टिकाते हैं, जो पूर्ण रूप से गलत है। अभिषेक हमेशा दोनों हाथों से किया जाना चाहिए। उन्होंने एक बच्चे का उदाहरण देते हुए बताया कि जब उससे इस प्रकार अभिषेक करने का कारण पूछा गया तो उसने सहज भाव से कहा कि हमारे दादाजी और सभी ऐसे ही करते हैं, इसलिए हम भी ऐसा करते हैं। जब उसे सही विधि समझाई गई तो उसने तुरंत दोनों हाथों से अभिषेक किया।
बुजुर्गों को कुतर्क से बचने की सीख
मुनि श्री ने बताया कि जब यही बात एक बुजुर्ग को समझाई गई तो वे कुतर्क करने लगे। इस पर गुरुदेव ने कहा कि कच्चे आम को पकाया जाए तो वह पक जाता है, लेकिन पके हुए आम को पकाया जाए तो वह सड़ जाता है। अतः बच्चों में बचपन से ही आगम सम्मत धर्म संस्कार डालना आवश्यक है।
भावों के अनुसार मिलता है फल
मुनि श्री ने कहा कि जैसी भावना होगी, वैसा ही परिणाम प्राप्त होगा। कोई भी क्रिया करने पर कृत, कारित और अनुमोदना का पुण्य मिलता है। जो स्वयं क्रिया करता है उसे अधिक पुण्य, जो सहयोग करता है उसे कुछ पुण्य और जो अनुमोदना करता है उसे भी पुण्य प्राप्त होता है। जो क्रिया करने में असमर्थ है, उसे भी पूर्ण क्रिया का पुण्य प्राप्त हो सकता है।
मेंढक और सेठ का प्रसंग
उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक सेठ पूर्व भव में नियमपूर्वक ध्यान और तप कर रहा था, किंतु अंत समय में पानी की प्यास से विचलित होकर उसकी मृत्यु हो गई और वह कुएं में मेंढक के रूप में जन्मा। बाद में जब भगवान महावीर का समवशरण राजगृह नगरी में आया, तो वह पूर्व भव के पुण्य के कारण कमल की पंखुड़ी मुख में लेकर समवशरण की ओर जा रहा था। मार्ग में हाथी के पैर के नीचे दबने से उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन पुण्य भावों के कारण वह तत्काल स्वर्ग में गया और वहां से विमान द्वारा भगवान के समवशरण में देवों के कोठे में विराजमान हुआ। इससे सिद्ध होता है कि भावों की विशुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अंत समय की भावना पर जोर
मुनि श्री ने कहा कि अपने भावों को सदैव विशुद्ध रखें। आज नहीं तो कल, भावों का फल निश्चित रूप से प्राप्त होता है। अंत समय में पंच परमेष्ठी का आलंबन और आश्रय होना चाहिए, जिससे अगला भव भी सुधर सके।
अन्य धार्मिक गतिविधियां
प्रवचन से पूर्व मुनि श्री ने मंदिर में दर्शन किए। श्रावकों द्वारा भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। प्रवचन के पश्चात मुनि संघ की आहार चर्या संपन्न हुई। दोपहर में सामायिक के बाद धर्म कक्षा आयोजित की गई। इसके पश्चात मुनि संघ का पार्श्वगिरी एवं सिद्ध क्षेत्र बावनगजा जी की ओर मंगल विहार हुआ। उपरोक्त जानकारी मनीष जैन द्वारा प्रदान की गई।













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