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धर्म, भाषा, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण का अद्वितीय कार्य : दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य उद्घाटन


कुंदकुंद ज्ञानपीठ, इंदौर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ पूज्य सागर जी महाराज के सानिध्य में हुआ। देशभर के विद्वानों ने प्राकृत वाङ्मय और सिरि भूवलय पर विचार रखे। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज़ की यह विशेष रिपोर्ट


जब ज्ञान, साधना और संस्कृति एक मंच पर आते हैं, तब इतिहास बनता है।

इंदौर शहर के लिए शनिवार का दिन विशेष और स्मरणीय बन गया। श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट द्वारा संचालित कुंद-कुंद ज्ञानपीठ, इंदौर की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में हुआ।

दीप प्रज्वलन से हुआ शुभारंभ

कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि सांसद शंकर लालवानी, कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. जयकुमार उपाध्ये सहित अन्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। वेदिका जैन की सांगीतिक प्रस्तुति से मंगलाचरण हुआ।

देशभर के विद्वान रहे उपस्थित

उद्घाटन सत्र में प्रो. रेणु जैन, कुलगुरु सुरेशकुमार जैन, प्रो. नलिन के शास्त्री, कुलगुरु शिवशंकर मिश्रा, प्रो. संगीता मेहता और राहुल सिंघई सहित अनेक विशिष्ट अतिथि मंचासीन रहे। इस अवसर पर इंजीनियर अनिलकुमार जैन द्वारा रचित ग्रंथ का विमोचन भी किया गया।

ज्ञानपीठ की भूमिका सराहनीय — सांसद

सांसद शंकर लालवानी ने कहा कि कुंदकुंद ज्ञानपीठ धर्म, भाषा, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। कासलीवाल परिवार की तीसरी पीढ़ी द्वारा इस कार्य को आगे बढ़ाना प्रेरणादायक है।

सिरि भूवलय और प्राकृत विद्या पर मंथन

इंजीनियर अनिलकुमार जैन ने सिरि भूवलय ग्रंथ का विस्तृत परिचय दिया। प्रो. संगीता मेहता ने कहा कि प्राकृत विद्या युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।

जन-जन की भाषा रही है प्राकृत

प्रो. नलिन के शास्त्री ने कहा कि प्राकृत स्वाभाविक रूप से आम जन की भाषा रही है और प्राचीन साहित्य का बड़ा भाग इसी में रचा गया, जिसने भाषा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साधु तीर्थ के समान — शिवशंकर मिश्रा

कुलगुरु शिवशंकर मिश्रा ने कहा कि पूज्य साधु तीर्थ के समान होते हैं। उनकी उपस्थिति से वातावरण आध्यात्मिक हो जाता है। जैन दर्शन का धर्मों के विकास में महनीय योगदान रहा है।

जिनवाणी के प्रचार का संदेश

अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज ने कहा कि जिनवाणी के प्रचार के लिए उसके महत्व को जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है। जब विद्वानों का ज्ञान, धनाढ्यों का सहयोग और साधु का सानिध्य एकत्र होता है, तब धर्म की प्रभावना निश्चित होती है।

सम्मान और संचालन

अतिथियों का सम्मान अमित कासलीवाल, आदित्य कासलीवाल एवं बाल ब्रह्मचारी अनिल भैया ने किया। कार्यक्रम का संचालन अरविंद जैन ने किया।

प्रदर्शनी और पांडुलिपियों की सराहना

कार्यक्रम से पूर्व अतिथियों ने कुंद-कुंद ज्ञानपीठ में स्थापित मूर्तियों के चित्रों की प्रदर्शनी और दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रह का उद्घाटन किया, जिसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई।

समाज जन उपस्थित रहे

कार्यक्रम में मनोहर झांझरी,दिलीप पाटनी,विजय काला, रितेश पाटनी,डी.के.जैन डीएसपी, दिलीप मेहता,रेखा जैन,संजय पापड़ीवाल,नरेन्द्र जैन,मनीष जैन,नवनीत जैन,श्रेष्ठी जैन,कमलेश जैन,विनोद जैन,हितेश जैन,वर्णित जैन आदि समाज जन उपस्थित रहे।

यह संगोष्ठी केवल आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को जीवंत करने का सशक्त प्रयास है।

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