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मुनि श्री प्रमाणसागरजी का राहतगढ़ में मंगल प्रवेश: समाज बंधुओं ने की भव्य मंगल अगवानी लगाए जयकारे 


नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। राहतगढ़ से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


राहतगढ़ (सागर)। नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। मुनि संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि संघ की मंगल अगवानी के अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज राहतगढ़ एवं मंगल विहार करा रहे भोपाल, विदिशा तथा आसपास के नगरों से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने मुनिसंघ की मंगल अगवानी की। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि हमारे जीवन में छोटी-छोटी बातों का बहूत गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जिस वातावरण और जिन लोगों के साथ रहते हैं, जिनके साथ हमारा रोज का उठना बैठना है तो हमारा व्यवहार भी ठीक वैसा ही बन जाता है।

मुनिश्री ने अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी

मुनि श्री ने एक पुरानी युक्ति सुनाते हुए कहा कि जैसी संगत वैसी रंगत। कुरल काव्य में लिखा है कि पानी का गुण बदल जाता है तथा जैसी मिट्टी में रहता है वैसा रंग हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य के स्वभाव में संगति का व्यापक प्रभाव होता है। इसलिए हमारी संस्कृति ने हमेशा अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि अच्छे लोगों की संगति में रहोगे तो तुम्हारा जीवन भी अच्छा बनेगा। मुनि श्री ने संगति के प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि जैसे गुलाब की क्यारी में रहने वाली मिट्टी में भी सुगंध आ जाती है तो नाली के किनारे रहने वाली मिट्टी में दुर्गंध आती है।

दुःसंगति से बचो सुःसंगति में रहो न रहो

मुनि श्री ने कहा कि हम जैसे माहौल में रहते हैं। हमारा व्यवहार भी उस पर निर्भर करता है। इसीलिए हमेशा अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी जाती है। आचार्य गुरुदेव एक नया दृष्टिकोण प्रकट कर कह रहे हैं कि दुःसंगति से बचो सुःसंगति में रहो न रहो। मुनि श्री ने कहा कि तुम अच्छो की संगति न कर पाओ तो कोई बात नहीं है लेकिन, बुरे की संगति से बचो क्योंकि, उससे तुम्हारा जीवन निश्चय ही बुरा बनेगा। उन्होंने कहा कि सत्संगति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन का उत्कर्ष कर सकता है, लेकिन दुःसंगति में फंसे व्यक्ति का पतन अवश्यंभावी है। प्रायः व्यक्ति अपनी संगति को अच्छी ही मानता है लेकिन, आपके मानने से संगति अच्छी नहीं हो सकती तो ऐसी कौन सी संगती है जो सुसंगति कहलाती है?

बुद्धिमान की संगति में रहोगे तो तुम्हारा ज्ञान भी विकसित होगा

मुनि श्री ने कहा कि जिससे हमें अच्छी प्रेरणा, अच्छी बातें सीखने को मिले। जिससे हमारी आदतें तथा हमारा चरित्र अच्छा बने और हम आगे बढ़ सकें, ऐसी संगति सुसंगति है। इसके विपरीत जो हमारे आचार विचार को भ्रष्ट करें हमारे चरित्र का पतन कराए वह दुःसंगति है। गुरुदेव कहते है कि ऐसी दुःसंगति से बचो। चुनाव हमेशा अच्छे की करो। मुनि श्री ने कहा कि लोग तर्क देते है कि हम ठीक हैं तो दुनिया हमारा क्या बिगाड़ लेगी तो मुनि कहते हैं कि काजल की कोठरी में जाओगे तो कहीं न कहीं दाग लग ही जाएगा। आत्मा का निमित्त और नैमित्तिक संबंध है जो आंतरिक रूप से मजबूत है उनको बचाव की आवशकता नहीं है लेकिन, जो आंतरिक रुप से कमजोर होते हैं उनका मन बहूत चंचल होता है तथा वह छोटे छोटे निमित्तों से प्रभावित हो जाते है। ऐसी स्थिति में बचाव करने की जरुरत है। मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों में हम मुनियों को भी अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी गई है। हमेशा अपने से अधिक बुद्धिमान की संगति में रहोगे तो तुम्हारा ज्ञान भी विकसित होगा।

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