मुरैना में वर्षायोग समापन अवसर पर आयोजित पिच्छिका परिवर्तन समारोह में मुनिश्री विलोकसागरजी को निर्यापक श्रमण पद प्रदान किया गया, जहां श्रद्धालुओं ने उल्लासपूर्वक जयघोष किए। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…
मुरैना के ऐतिहासिक बड़े जैन मंदिर में वर्षायोग समापन के पावन पर्व पर विशाल धर्मसभा का आयोजन हुआ, जिसमें जैन परंपरा के महत्वपूर्ण ‘पिच्छिका परिवर्तन’ संस्कार का आयोजन हुआ। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की महिमा पर प्रकाश डाला तथा बताया कि मोर पंख से निर्मित पिच्छिका जैन मुनि का प्रमुख उपकरण है, जो सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा हेतु उपयोग होती है। इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने भी श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि ऐसे पारंपरिक अनुष्ठान समाज में संयम और त्याग की प्रेरणा देते हैं।
समारोह के दौरान ही आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज (इंदौर) की ओर से संदेश प्राप्त हुआ कि पूज्य मुनिश्री विलोकसागरजी को ‘निर्यापक श्रमण’ पद से अलंकृत किया गया है, जिसके चलते सभा तालियों एवं “जय हो गुरुदेव” के जयघोषों से गूंज उठी। इस उपाधि के साथ उन्हें दीक्षा प्रदान करने, साधुओं को प्रायश्चित देने तथा संघ संचालन संबंधी अधिकार प्राप्त हो गए। युगल मुनिराजों को नई पिच्छिका भेंट करने का सौभाग्य वरिष्ठ श्रावकश्रेष्ठियों को मिला, वहीं पुरानी पिच्छिकाएं श्रद्धालु परिवारों को प्रदान की गईं। विभिन्न नगरों — सिलवानी, झांसी, ललितपुर, पोरसा आदि से आए बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने आयोजन में भाग लिया।
कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं, समाज के प्रतिभाशाली बालक-बालिकाओं को सम्मानित किया गया तथा भक्तों ने मुनिराजों के चरण पखारे। इसके बाद सोमवार दोपहर 03 बजे जैन संतों का पोरसा की ओर मंगल विहार हुआ, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु पदयात्रा में “जिनेन्द्र प्रभु की जय” के उद्घोषों के साथ शामिल हुए।













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