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साधु संत चलते फिरते तीर्थ हैं – मुनिश्री विबोधसागर जी : साधु संत संयमी जीवन की प्रेरणा देते हैं – मुनिश्री विलोकसागर


मुरैना के बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी और मुनिश्री विबोधसागरजी ने साधु संतों के महत्व पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि जैन साधु संत त्याग, संयम और तप के आदर्श हैं जो गृहस्थों के लिए प्रेरणा स्रोत बनते हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


मुरैना के बड़े जैन मंदिर में आयोजित भव्य धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज और मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने साधु-संतों के महत्व पर अपने मंगल प्रवचन दिए।मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि साधु संत संयमी और तपस्वी जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। जैन दर्शन में साधुओं का स्थान सर्वोच्च माना गया है। वे भौतिक सुखों का त्याग कर आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। जैन साधु केवल अपने आत्मकल्याण तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज को भी संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं। उनकी संगति से गृहस्थों के अहंकार का नाश होता है और आत्मिक शांति की अनुभूति होती है।

वहीं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि साधु संत चलते-फिरते तीर्थ होते हैं। भगवान को प्रत्यक्ष रूप से कोई नहीं देख सकता, लेकिन साधु संतों के माध्यम से ही भगवान के स्वरूप और उनके सिद्धांतों का दर्शन होता है। साधु संत अपने तप, त्याग और संयममय जीवन से आमजन को धर्म मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं।

उन्होंने कहा कि साधु संतों की संगति से मन के विकार और मलिनता दूर होती है। उनके उपदेश मानव जीवन को सहज, सरल और शांतिमय बनाते हैं। इसलिए जब भी साधु संतों का सान्निध्य मिले, उसे ग्रहण करना चाहिए और उनकी सेवा एवं वैयावृत्ति का अवसर छोड़ना नहीं चाहिए। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और संतों के प्रवचनों से धर्मलाभ प्राप्त किया।

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