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सच्चे सुख का स्वाद लेना है तो आकिंचन्य धर्म का पालन करें : आर्यिका मां विकुंदन श्री ने बड़वानी में उत्तम आकिंचन्य धर्म पर दिया उपदेश 


जब तक आपके जीवन ने आकिंचन्य धर्म नहीं आएगा आप सच्चे सुख के स्वाद को नहीं चख पाओगे। यह उद्गार बड़वानी में विराजित आचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका मां विकुंदन श्री ने व्यक्त किए। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर…


धामनोद। जब तक आपके जीवन ने आकिंचन्य धर्म नहीं आएगा आप सच्चे सुख के स्वाद को नहीं चख पाओगे। यह उद्गार बड़वानी में विराजित आचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका मां विकुंदन श्री ने दस लक्षण पर्व के नौवें दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म पर उपदेश देते हुए कही। उन्होंने कहा कि आपको सब छोड़कर मोक्ष मार्ग पर चलना है। आप बाहर से कितना ही छोड़ दो, जब तक अंदर की मूर्छा शांत नहीं होगी। तब तक आकिंचन्य धर्म प्राप्त नहीं होगा। मूर्छा परिग्रह से काम, क्रोध और क्रोध से हिंसा होती है और हिंसा से दुर्गति का मार्ग मिलता है। उन्होंने कहा कि आचार्य कहते है आकिंचन धर्म को अपने अंदर धारण करो। जब तक अपने सारे परिग्रह छोड़ोगे नहीं उत्तम आकिंचन धर्म नहीं आ सकता।

उसकी बोरी खाली हुई तो गुरु के पास शिखर पर पहुंचा शिष्य 

पूज्य माताजी ने दृष्टांत देते हुए बताया कि एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और उनसे कहा कि मैने अपना घर, बार, पैसा, संपत्ति, जमीन जायदाद, माता-पिता, भाई-बहन, रिश्ते नातेदार सब छोड़ दिए पर मुझे अभी तक परमेश्वर के दर्शन नहीं हुए। तब गुरु ने शिष्य से कहा कि मैं तुम्हें सब ऊपर पर्वत के शिखर पर सब बताऊंगा और पर्वत के शिखर पर जाने के बाद गुरु ने अपने शिष्य को कहा कि तुम एक बोरी में कंकर और पत्थर लेकर चढ़ोगे गुरु की आज्ञा से वह शिष्य एक बोरी में पत्थर और कंकड़ लेकर जल्दी जल्दी पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगा किंतु बोरी में भरा वजन होने से चढ़ने में दिक्कत आ रही थी तो उसने उस बोरी में से कंकड़ पत्थर छोड़ता गया और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता गया और वो जैसे ही खाली होता गया वो जल्दी ऊपर की ओर चढ़ता गया और जैसे ही उसकी बोरी खाली हुई तो वो गुरु के पास शिखर पर पहुंच गया।

ये शिक्षा केवल श्रमण के लिए ही नहीं श्रावक के लिए भी है

तब गुरुजी ने उससे पूछा कि तुमको मैने कंकड़ पत्थर लाने के लिए कहा था तो तुम नहीं लाए तब शिष्य बोला कि मैने आपके वचनों का पालन तो किया, लेकिन रास्ते में मैं उसे छोड़ते आया ,तब गुरु जी ने समझाया कि तुम्हारे पास परिग्रह का वजन था। उसको छोड़ा तब तुम ऊपर आ पाए। उसी प्रकार हमारे अंदर जो परिग्रह का वजन है उसे हम छोड़ेंगे नहीं तब तक हमे भी परमात्मा की नजदीकी नहीं मिलेगी और जैसे-जैसे परिग्रह को छोड़ोगे परमात्मा के निकट पहुंचते जाओगे। आप थोड़े से भी परिग्रहवान, मूर्छावान है वो आपके लक्ष्य में बाधक होगा। ये शिक्षा केवल श्रमण के लिए ही नहीं श्रावक के लिए भी है।

अपना जीवन एक रंगमंच है 

आर्यिका श्री ने कहा कि आप लोभ कषाय को छोड़ कर तप त्याग की कसौटी पर खरे नहीं उतरोगे। तब तक उत्तम आकिंचन्य धर्म आपके भीतर प्रवेश नहीं करेगा । नाकिंचनम ही आकिंचन्म याने मेरा कुछ नहीं है ये ही आकिंचन धर्म है। अपना जीवन एक रंगमंच है और उसमें से एक एक दिन खत्म हो रहा है और हम मैं-मैं कर रहे हैं जबकि, कुछ भी हमारा नहीं है। एक दिन सब समाप्त हो जाएगा। इसलिए समय रहते हुए संभल जाओ अपने अंदर की कषाय को छोड़ दो। आज प्रातः भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, आरती, पूजन संपन्न हुई। दोपहर को माताजी ने तत्त्वार्थ सूत्र का स्वाध्याय करवाया,शाम को प्रतिक्रमण और आरती शास्त्र प्रवचन हुए।

अनंत चतुर्दशी पर होंगे धार्मिक आयोजन 

शनिवार को अनंत चतुर्दशी के उपलक्ष्य में पार्श्वगिरी में विराजित गणिनी आर्यिका मां क्षमा श्री जी का ससंघ आगमन होगा और क्षमा श्री माताजी और विकुंदन श्री माताजी के ससंघ सानिध्य में भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, आरती, उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर प्रवचन होंगे। साथ ही आर्यिका माताजी की आहार चर्या होगी। दोपहर को दोनों आर्यिका संघ के सानिध्य में भगवान की शोभायात्रा नगर के मुख्य मार्ग से निकाली जाएगी। पश्चात भगवान के अभिषेक,शांतिधारा ,आरती संपन्न होगी एवं दसलक्षण की माल की बोली होगी।

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