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मन की इच्छाओं को रोकना ही सबसे बड़ा तप है : मुनिश्री जयंत सागर जी महाराज ने नांद्रे में धर्मसभा में त्याग की महिमा बताई


पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। नांद्रे से अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…


नांद्रे। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। उत्तम त्याग धर्म पर मुनि श्री जयंत सागरजी ने प्रवचन में कहा कि जीवन में तपस्वियों के संगत में तप के भाव अपने आप उत्पन्न हो जाते हैं और इच्छा को रोकने का तप करना चाहिए। इच्छा की वृद्धि करना तप नहीं हैं, नहीं तो आपको कुछ वस्तु पसंद थीं और वह वस्तु नहीं मिली तो आपने भोजन करना बंद कर दिया और डॉक्टर ने बोला कि शक्कर बंद कर दो तो आपने बंद कर दी, ये तप नहीं।

साम्य भाव में बैठ जाओ वहीं ध्यान है 

अपने अंतरंग भावों से त्याग, संयम तप ग्रहण करने का भाव ही तप है और वहीं तपस्वी है। इसलिए जो जितना भी तप करने योग्य हो उतना तप करें। तप कभी खींचना नहीं चाहिए और तप यानि ध्यान, कभी ध्यान के लिए ध्यान केंद्र की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को शांत भाव में रख लो, साम्य भाव में बैठ जाओ वहीं ध्यान है और ध्यान के लिए कोई ध्यान केंद्र की ज्यादा आवश्यकता नहीं है और अपने स्वास्थ्य को सही करना है तो हमें उपवास, अनोदर जैसे तप को करते रहना चाहिए। चारों प्रकार के आहार, जल के त्याग के साथ उपवास होता है और भूख से कम खाना अनोदर तप है। ये सब करने से हम भी तप करके तपस्वी बन सकते है।

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