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बड़वानी में आर्यिका विकुंदन श्री के सानिध्य में पर्यूषण पर्व की धूम – आर्जव धर्म पर विशेष उपदेश : दस लक्षण पर्व पर सरलता और मन वचन काय के मेल से आर्जव धर्म का महत्व समझाया


बड़वानी में 30 सितंबर भद्र शुक्ल सप्तमी को पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने धर्म सभा में आर्जव धर्म के महत्व और सरलता की आवश्यकता पर विस्तृत उपदेश दिए। उन्होंने बताया कि मन, वचन और काय का एक होना आर्जव धर्म है। साधु और महापुरुष सरलता और सच्चाई के प्रतीक होते हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


बड़वानी में 30 सितंबर भद्र शुक्ल सप्तमी को जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। नगर में विराजित राष्ट्र संत गणाचार्य विराग सागर जी महाराज की शिष्या, श्रमणि विदुषी आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ससंघ के सानिध्य में इस पर्व का आयोजन बड़ी ही भक्ति और धूमधाम के साथ संपन्न हुआ। आज प्रातः भगवान के अभिषेक, शांतिधारा और आरती पाण्डुक शीला पर संपन्न हुई। इसके पश्चात नित्य नियम की पूजन, दस लक्षण और सोलह कारण जी की पूजन की गई। आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए आर्जव धर्म पर उपदेश दिया। माताजी ने बताया कि आर्जव का अर्थ है सीधे बनो, सरल बनो और मन वचन काय से एक बनो। जो व्यक्ति अपने दोषों को नहीं छुपाता और किसी के प्रति कुटिल विचार नहीं रखता, वही आर्जव धर्म का पालन करता है।

बालक सीखता है वही बोलता है 

उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि साधु मन, वचन और काय से सरल होते हैं, जैसे बांसुरी जब बजती है तो मधुर और सीधी होती है। वहीं सांप टेढ़ा चलता है पर जब बिल में जाता है तो सीधे प्रवेश करता है। इसी प्रकार, एक बालक निष्छल होता है और जो सीखता है वही बोलता है।

सरलता और सीधा विचार सिखाया जाए

माताजी ने पूज्य आचार्य श्री विराग सागर जी के दृष्टांत साझा किए कि क्षुल्लक अवस्था में उन्होंने रसी का त्याग कर आहार में केला और सेवफल लिया और गुरु आचार्य सन्मति सागर जी को ईर्या पथ प्रतिक्रमण में बताया। गुरु महाराज ने गलती मालूम होने पर प्रायश्चित लिया। माताजी ने कहा कि माता अपने बच्चों को महावीर बना सकती है यदि उन्हें सरलता और सीधा विचार सिखाया जाए। जब तक मन में सरलता और सीधा भाव नहीं आएगा, व्यक्ति अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता और संसार में भ्रमित रहेगा।

गोली का घाव भरता बोली का घाव नहीं भरता

आचार्य भगवंत का उपदेश है कि हमेशा झुकने का भाव रखें और संतों के प्रवचन को पहले अपने जीवन में उतारें। सरलता और आर्जव धर्म का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति जीवन में सच्चाई और ईमानदारी अपनाता है। उन्होंने कहा कि गोली का घाव भर जाता है, पर बोली का घाव नहीं भरता, अतः हितकारी, मित्रवत और प्रिय वचन बोलें और हमेशा झुकने का भाव रखें।

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