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जिनके विचार पवित्र है, उनका ही भविष्य उज्जवल है : आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने कहा जीव संयम धारण कर भव पार हो जाते हैं 


आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज का मंगल चातुर्मास पथरिया में चल रहा है। यहां पर गुरु भक्त उनके दर्शन और पूजन के लिए बड़ी संख्या में आ रहे हैं। यहां आचार्यश्री और मुनिराजों के नित प्रवचन हो रहे हैं। धर्मसभा में बड़ी संख्या में धर्मानुरागी समाजजन इनका लाभ ले रहे हैं। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…


पथरिया। आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज का मंगल चातुर्मास पथरिया में चल रहा है। यहां पर गुरु भक्त उनके दर्शन और पूजन के लिए बड़ी संख्या में आ रहे हैं। यहां आचार्यश्री और मुनिराजों के नित प्रवचन हो रहे हैं। धर्मसभा में बड़ी संख्या में धर्मानुरागी समाजजन इनका लाभ ले रहे हैं। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में कहा कि गुरु जहाज के समान होते हैं, जैसे नौका में बैठकर व्यक्ति नदी पार करते हैं, वैसे ही गुरुवाणी सुनकर भव्य-जीव संयम धारण कर भव पार हो जाते हैं। संसार में धर्म ही शरणभूत है। गुरुओं की वाणी यथार्थ का बोध कराने वाली परम-औषधि है, जो जन्म-मरण रूपी रोगों की दवाई है। भव पार करना है तो गुरुओं की शरण प्राप्त करो। संसार में संकटो से दूर करने वाला यदि कोई है तो वह एक मात्र सच्चा धर्म ही है, जो अहिंसा से परिपूर्ण है। जिनके विचार पवित्र हैं, उनका ही भविष्य उज्वल है। जिनका संयम निर्दाेष होगा, वही मुक्ति प्राप्त कर सकता है, जो वैराग्य से भरा है, वहीं अपने संयम की रक्षा कर सकता है।

जो आकांक्षाओं से भरा है, उसे चिंता संक्लेशतापूर्ण जीवन जीना पडे़गा। जिसकी चर्चा एवं चर्या निर्दाेष होगी। उसकी यश-पताका हमेशा लहराती रहेगी। समाज की उन्नति के लिए विद्वान एवं धनवान दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। रत्नो मंे वज्र, चंदनांे में मलयागिरी चंदन, तीर्थाें में सम्मेद शिखर, मंत्रों में महामंत्र णमोकार श्रेष्ठ है। उसी प्रकार धर्माे में वीतराग-धर्म सर्वश्रेष्ठ है। विचारों में पवित्रता, क्रिया में अहिंसा, दृष्टि में अनेकांत, वाणी में स्याद्वाद ही जैन धर्म है।

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