प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर महाराज आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव और दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत टोंक नशियां में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में इंद्र ध्वज महामंडल विधान का आयोजन हुआ। इस अवसर पर घट यात्रा, ध्वजारोहण और मंगल कलश स्थापना हुई। आचार्य श्री ने उपदेश में समयदान को द्रव्य दान से अधिक महत्वपूर्ण बताया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…
टोंक के श्री दिगंबर जैन नशियां में प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर महाराज की आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव अंतर्गत पर्युषण पर्व और दशलक्षण महापर्व के अवसर पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज संसंघ के सानिध्य में इंद्र ध्वज महामंडल विधान का भव्य आयोजन हुआ।
प्रातःकाल घट यात्रा, ध्वजारोहण, पंडाल उद्घाटन, मंगल कलश स्थापना और अंकुरारोपण सहित धार्मिक क्रियाएं विधानाचार्य पंडित कीर्तिय पारसोला के निर्देशन में आचार्य श्री के मंगल मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुईं।
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में कहा कि मध्य लोक के 458 अकृत्रिम जिनालयों की पूजन देवता करते हैं और ये जिन मंदिर 500 धनुष ऊँचाई के होते हैं। यह महामंडल विधान का अवसर अत्यंत पुण्यदायी है। उन्होंने बताया कि आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने पुरुषार्थ से इंद्र ध्वज मंडल विधान की रचना की है।
दस अंगों की चर्चा और तत्वार्थ सूत्र का वाचन
आचार्य श्री ने कहा कि कोई भी कार्य तन, मन और धन के पुरुषार्थ से ही पूर्ण होता है। धार्मिक क्रियाओं में द्रव्य दान से अधिक समयदान महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक आपदाएँ पुण्य अर्जन से टल जाती हैं। प्रतिदिन जिनालयों की अभिषेक-पूजन और भक्ति भाव से आराधना करनी चाहिए। दशलक्षण पर्व में धर्म के दस अंगों की चर्चा और तत्वार्थ सूत्र का वाचन भी किया जाएगा। इंद्र ध्वज महामंडल विधान आत्मा को परमात्मा बनाने का माध्यम है। इसके पूर्व घट यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होकर श्री आदिनाथ मंदिर, अमीरगंज नशियां में पहुँची जहाँ ध्वजारोहण मोहनलाल पदमचंद ज्ञानचंद मनोज छामुनिया परिवार द्वारा और मंगल कलश स्थापना सौधर्म इंद्र दिनेश-बिना जैन छामुनिया परिवार द्वारा की गई। 28 अगस्त से दशलक्षण पर्व के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा।













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