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अपने भीतर की शांति को मज़बूत करना होगा: मुनिश्री ने शांति के स्रोत को मजबूत करने का मार्ग दिखाया 


नगर में मुनिराजों के वर्षायोग चातुर्मास के चलते धर्मसभा में मंगल वचनों की अपूर्व वर्षा हो रही है। मुनियों के प्रवचन से यहां की धर्मप्रेमी जनता का धर्म आराधना के प्रति रुझान महत्वपूर्ण स्तर पर है। मुनिराज जीवन के हर पहलुओं पर देशना देकर समाजजनों को आत्म कल्याण और संस्कृति के प्रति प्रेरित और जागरूक कर रहे हैं। पथरिया से पढ़िए, यह खबर…


पथरिया। नगर में मुनिराजों के वर्षायोग चातुर्मास के चलते धर्मसभा में मंगल वचनों की अपूर्व वर्षा हो रही है। मुनियों के प्रवचन से यहां की धर्मप्रेमी जनता का धर्म आराधना के प्रति रुझान महत्वपूर्ण स्तर पर है। मुनिराज जीवन के हर पहलुओं पर देशना देकर समाजजनों को आत्म कल्याण और संस्कृति के प्रति प्रेरित और जागरूक कर रहे हैं। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने कहा कि पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का चातुर्मास यहां जारी है और उनके शिष्य विचित्र बाते प्रणेता मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी ने प्रवचन में मंगलवार को कहा कि जीवन में अनेक बार हमें ऐसे क्षणों का सामना करना पड़ता है, जब अन्याय, अपमान या कटुता से मन विचलित हो उठता है। उस क्षण पर प्रतिक्रिया देना आसान होता है पर प्रतिक्रिया देना हमेशा समाधान नहीं होता। हमारे भीतर का जो शांति का स्रोत है, वह तभी प्रकट होता है जब हम प्रतिक्रिया देने के स्थान पर ठहरते हैं। जब कोई हमें चोट पहुंचाए और हम बदले में कुछ न कहें, बल्कि अपने भीतर शांति बनाए रखें, वही हमारा आत्म-बल है।

जहां मन स्थिर रहता है, वहां कोई भी नकारात्मकता नहीं 

बुराई का उत्तर बुराई से देने से केवल द्वेष बढ़ता है। यह एक अंतहीन श्रृंखला है, जो कभी समाप्त नहीं होती लेकिन, जब हम संयम रखकर उत्तर नहीं बल्कि मौन या सद्भाव से प्रतिक्रिया देते हैं तो हम उस श्रृंखला को वहीं तोड़ देते हैं। महानता किसी बड़े पद, वाणी या बाहरी प्रदर्शन में नहीं है। वह तो भीतर की उस स्थिति में है जहां मन स्थिर रहता है, वहां कोई भी नकारात्मकता उसे हिला नहीं सकती। उन्होंने कहा कि अतः यही आग्रह है कि अपने भीतर की शांति को मज़बूत करो, प्रतिक्रिया के स्थान पर सजगता लाओ, और जीवन को ऊंचाई दो।

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