दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 166वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
उज्ज्वल देखि न दीजिये, वग ज्यू माड़े ध्यान।
धीरे बोटी चपेटसी, यूं ले बूडे ग्यान।।”
कबीर दास जी इस दोहे में बाहरी आडंबर और चमक-दमक से भ्रमित न होने की चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं — जैसे पानी की सतह पर सुंदरता और सफाई दिखे, पर भीतर गहराई में भंवर (माड़ा) हो तो वह खींचकर डुबा देता है; वैसे ही कुछ लोग बाहर से उज्ज्वल, मीठे वचनों और आकर्षक व्यक्तित्व वाले दिखते हैं, लेकिन भीतर छल, स्वार्थ और धोखे से भरे होते हैं।
यदि हम केवल बाहरी रूप, वाणी और व्यवहार पर भरोसा करके अपने मन को पूरी तरह सौंप दें, तो अंततः वही लोग हमें संकट में डाल सकते हैं और हमारा ज्ञान, विवेक तथा आत्मबल नष्ट कर सकते हैं।
समाज में कई लोग चमकदार शब्दों और दिखावे से विश्वास जीत लेते हैं, लेकिन उनकी नीयत साफ नहीं होती। कबीर का संदेश है — रिश्तों, दोस्ती और व्यवहार में सिर्फ़ बाहरी छवि देखकर निर्णय न करें। व्यक्ति के असली स्वभाव को परखने के लिए समय और धैर्य आवश्यक है।
जीवन में हमें हर बात को बिना परखे मान लेने की बजाय तथ्यों और सच्चाई की जांच करनी चाहिए। अंधविश्वास और भावुकता में लिए गए निर्णय अक्सर धोखा और हानि का कारण बनते हैं।
आज के सोशल मीडिया और डिजिटल युग में “उज्ज्वल” छवि बनाना बहुत आसान है — प्रोफ़ाइल, फोटो, वीडियो और मीठे शब्दों से लोग जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन कबीर की वाणी हमें सचेत करती है कि ऑनलाइन और ऑफ़लाइन जीवन में सिर्फ़ दिखावे पर भरोसा न करें, असली चरित्र को पहचानें।
हर उज्ज्वल चेहरा सच्चा नहीं होता। जैसे सतह के नीचे छिपा भंवर डुबा देता है, वैसे ही छल-छद्म में फंसा मन धीरे-धीरे अपना विवेक और ज्ञान खो देता है।













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