आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने कहा कि भगवान मुनिसुव्रतनाथ की जन्मभूमि ‘राजगृही’ में ‘मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर’ एवं विपुलाचल पर्वत की तलहटी में मानस्तंभ रचना, भगवान महावीर की निर्वाण स्थली पावापुरी में जलमंदिर के समक्ष पांडुकशिला परिसर में भगवान की खड्गासन प्रतिमा सहित भगवान महावीर जिनमंदिर, गौतम गणधर स्वामी की निर्वाण स्थली गुणावां जी में गौतम स्वामी की खड्गासन प्रतिमा सहित जिनमंदिर, श्री सम्मेदशिखर जी में भगवान ऋषभदेव मंदिर आदि निर्माण भी गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से ही हुए हैं। अयोध्या से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
अयोध्या। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि -भगवान मुनिसुव्रतनाथ की जन्मभूमि ‘राजगृही’ में ‘मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर’ एवं विपुलाचल पर्वत की तलहटी में मानस्तंभ रचना, भगवान महावीर की निर्वाण स्थली पावापुरी में जलमंदिर के समक्ष पांडुकशिला परिसर में भगवान की खड्गासन प्रतिमा सहित भगवान महावीर जिनमंदिर, गौतम गणधर स्वामी की निर्वाण स्थली गुणावां जी में गौतम स्वामी की खड्गासन प्रतिमा सहित जिनमंदिर, श्री सम्मेदशिखर जी में भगवान ऋषभदेव मंदिर आदि समस्त निर्माण भी गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से ही हुए हैं। तीर्थंकर जन्मभूमि विकास की श्रृंखला में भगवान पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि काकंदी में श्री पुष्पदंतनाथ जिनमंदिर का निर्माण कार्य होकर उसमें भगवान पुष्पदंतनाथ की विशाल सवा 9 फीट की उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा पंचकल्याणक प्रतिष्ठापूर्वक विराजमान हो चुकी है।
तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में वर्तमानकालीन वहां जन्में पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि की टोकों पर जिनमंदिर निर्माण की प्रेरणा प्रदान कर आपने संस्कृति को जीवंत करने का अभूतपूर्व प्रयास किया है। उस श्रृंखला में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की टोंक पर सन् 2011 में सुंदर कलात्मक मंदिर बनकर उसमें सवा चार फीट पद्मासन श्वेत प्रतिमा विराजमान हुई है तथा सरयू नदी के तट पर जून 2013 में भगवान अनंतनाथ के मंदिर का निर्माण होकर वेदी में भगवान की सवा दस फीट की उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा विराजमान की गई है। इसी प्रकार जून 2014 में भगवान अजितनाथ की टोंक पर विशाल जिनमंदिर का निर्माण तथा दिसंबर 2014 में भगवान अभिनंदननाथ की टोंक पर विशाल जिनमंदिर का निर्माण करके वेदी में 5-5 फीट की सुंदर पद्मासन प्रतिमाएं विराजमान की गई हैं और भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं हुई हैं।
साथ ही वहां निर्मित भरत-बाहुबली टोंक का भी नवनिर्माण होकर आज अयोध्या तीर्थ एक विकसित स्वरूप में जनमानस के आकर्षण का केंद्र बन गया है। उसी श्रृंखला में श्री सुमतिनाथ भगवान की टोंक पर भी सन् 2019 में पंचकल्याणक करके भव्य मंदिर निर्माण किया गया है। अनेक वर्षों से अड़चनों को प्राप्त हो रही भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि सिंहपुरी-सारनाथ में भगवान की विशाल प्रतिमा का पंचकल्याणक महोत्सव जनवरी 2005 में सानंद हुआ। भगवान वासुपूज्य की जन्मभूमि चम्पापुरी में भगवान वासुपूज्य की लाल ग्रेनाइट की 31 फीट की विशाल खड्गासन प्रतिमा माताजी की प्रेरणा का ही सुफल है। वर्तमान में भगवान शीतलनाथ की जन्मभूमि भद्दिलपुर-भद्रिकापुरी का विकास कार्य माताजी के विशेष आशीर्वाद से अविरल गति से चल रहा है और भगवान मल्लिनाथ-नमिनाथ की जन्मभूमि मिथिलापुरी के विकास का कार्य भी प्रारंभ हो चुका है।













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