मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज ने बुधवार को प्रवचन में आस्था और आस्थावान के विवेचन में बहुत ही सारगर्भित बातों का जिक्र किया। भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास में मुनिराजों के प्रवचन और धर्मसभा में दी जा रही धर्म देशना से स्थानीय सकल जैन समाजजन लाभान्वित हो रहे हैं। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…
नांद्रे। मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज ने बुधवार को प्रवचन में आस्था और आस्थावान के विवेचन में बहुत ही सारगर्भित बातों का जिक्र किया। भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास में मुनिराजों के प्रवचन और धर्मसभा में दी जा रही धर्म देशना से स्थानीय सकल जैन समाजजन लाभान्वित हो रहे हैं। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने बताया कि आचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। बुधवार को यहां मुनि श्री सारस्वत सागरजी महाराज ने कहा कि आस्था में गति है। जीवन में जितनी भी हमारी क्रिया-प्रक्रिया हैं वे सब हमारी आस्था पर टिकी हुई हैं। जहां हमारी आस्था होती है वहां कितने भी संकट हो, या वहां पहुंचने में भी कितने ही संकट हो परंतु, आस्थावान व्यक्ति उन संकटों की परवाह नहीं करता है।
वह तो सदा ही अपनी गति में रहता है और आस्था जिस पर दी है, उसको देखकर संपूर्ण मार्ग के संकट को हम भूल जाता है। आस्था में सुख है, अनास्था में दुख है। आस्था में संपत्ति आस्था में समय, आस्था में गति और आस्था में ही अपनापन है, इसलिए प्राणी मात्र के प्रति अपने आपको आस्थावान बना लो तो आपका नियम से कल्याण मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।













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