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श्रेष्ठ को नकारे नहीं उसे तुरंत करे हासिल : फूलों के माध्यम से संत ने समझाया चयन का मापदंड 


जीवन में चयन का क्या महत्व होता है। चयन का मापदंड भी कितना सहज और सरल हो सकता है। अच्छे और अच्छे के मोह में बंधे युवा श्रेष्ठ को भी नकारते चले जाते हैं। इसी बात को दिगंबर जैन संत ने शंका समाधान में कितने सहजता से युवा पीढ़ी के लिए संदेश दिया। इसका उत्तम उदाहरण है यह प्रस्तुत लघुकथा। वैसे यह लघुकथा साभार है, लेकिन इसका संदेश सकल समाज के लिए होने से यहां प्रस्तुत है। पढ़िए यह लघुकथा…


(लघु् कथा)-सबसे सुंदर फूल-‘शादी‘

इंदौर। जैन संत का चातुर्मास चल रहा था। हर दिन प्रवचन के बाद एक प्रश्न-उत्तर सत्र रखा जाता, जिसमें कोई भी श्रद्धालु अपनी जिज्ञासा, जीवन की उलझन या व्यवहारिक समस्या रख सकता था। संत बड़ी सहजता, तर्क और करुणा के साथ उनका समाधान करते थे-जैसे किसी पिता का मन बोल रहा हो। एक दिन एक वृद्ध दंपति भावुक होकर बोले,‘महाराज जी! हमारे बच्चे अब 30 की उम्र के हो चले हैं। अच्छे रिश्ते आते हैं, पर वो हर बार मना कर देते हैं। उन्हें कोई भी पसंद नहीं आता। हम बहुत चिंतित हैं, क्या करें? ’महाराज मुस्कुराए- आपका प्रश्न आज के समय की सच्ची पीड़ा है लेकिन, इसका उत्तर युवाओं को ही देना होगा-एक कार्य करें, एक विशेष दिन केवल परिपक्व अविवाहित युवक-युवतियों का सत्र रखिए। मैं उनसे बात करना चाहूंगा…’ आयोजकों ने घोषणा की- इस ‘रविवार दोपहर 3 बजे केवल युवाओं के लिए विशेष संवाद-सत्र होगा, और सभी को अपने घऱ के युवा को लाना होगा।’

रविवार का दिन था। सभा हाल युवाओं से खचाखच भरा था-कहीं आँखों में उलझन थी, कहीं मन में अपने निर्णय को सही साबित करने की जिद और कहीं बस चुप्पी’

संत ने माइक संभाला। कोई उपदेश नहीं दिया, बस धीमे स्वर में बोले-क्या तुम सभी जीवन में कुछ करना चाहते हो? सफल होना? सुखी होना?

सभी सिर हिलाते हैं। फिर बोले-तो जानो- जीवन में सफल वही होते हैं, जो निर्णय लेना जानते हैं, जो समझौते को कमजोरी नहीं, परिपक्वता मानते हैं और जो रिश्तों को ‘खोजना’ नहीं, बल्कि ‘बुनना’ जानते हैं।’ सब सुन रहे थे। भावनाएं भीतर तक उतर रही थीं। अचानक संत ने कहा- अब हम एक छोटी-सी गतिविधि करेंगे। चलो, आज जीवन का उत्तर फूलों से पूछते हैं…। सभागार के पीछे एक बड़ा फूलों का बगीचा था-रंग-बिरंगे फूल, सुगंधित पत्तियाँ, हवाओं में महक। संत ने कहा-

ष्इस बगीचे में से हर व्यक्ति को ‘सबसे सुंदर फूल’ चुनकर लाना है। पर एक शर्त है- अगर तुम किसी फूल को पीछे छोड़ दोगे, तो फिर लौटकर उसे नहीं ले सकते।

‘क्या सब तैयार हैं?’ ‘हाँ!’ -एक साथ आवाजें उठीं। और फिर सब निकल पड़े…

रास्ते में एक से बढ़कर एक फूल दिखे- गुलाब, मोगरा, सूर्यमुखी, चमेली, चम्पा…

पर सबने सोचा-“अभी और आगे चलें, शायद सबसे सुंदर आगे मिलें….”

फिर आगे… और आगे… पर अचानक वे बगीचे के अंत तक पहुंच गए। अब कोई ढंग का फूल नहीं था लेकिन, अब पीछे लौटने की अनुमति नहीं थी… हाँ!काफी युवक-युवतियां हाथ में फूल लेकर लौटे- उन्होंने जल्दी निर्णय लिया था। पर 10-12 युवा ऐसे थे, जो खाली हाथ लौटे। सभा में सभी खड़े हुए। संत ने पूछा

‘कितनों के पास फूल हैं?’

कुछ हाथ उठे। फिर आवाज़ गुंजी..

‘कितने खाली हाथ लौटे?’

12 सिर झुकाये खडे हो गए… संत ने गहरी सांस ली और बोले-तुम्हारे जैसे ही वे युवा हैं, जो आज रिश्तों से भागते हैं, विवाह को टालते हैं- सोचते हैं कि और सुंदर रिश्ता, और परिपकव आगे होगा लेकिन, बच्चो, ये ‘सबसे सुंदर’ नाम की कोई चीज़ होती ही नही है, सुंदरता वह नहीं जो दिखे, सुंदरता वह है जो तुम्हारे निर्णय से सजे। ‘रिश्ता वही श्रेष्ठ है, जिसे तुम समझदारी से अपनाओ, उसे प्यार दो, उसकी कद्र करो।

प्यार खोजने की चीज़ नहीं, देने की प्रक्रिया है।रिश्ता पूर्ण तभी बनता है जब तुम अधूरेपन में भी अपनापन देख सको…’

सभा शांत थी।

शब्द नहीं, भाव बोल रहे थे।

‘याद रखना-जो जल्दी निर्णय ले लेता है, वह जीवन के बगीचे में मुस्कुराता है और जो देर करता है, वह अक्सर खाली हाथ लौटता है- पछतावे और अकेलेपन के साथ।

तय करो- तुम फूल लोगे, या प्रतीक्षा करते रहोगे? उस दिन कई युवाओं की सोच बदली। किसी ने पहली बार रिश्ते को आदर्श नहीं, संवेदनशील समझौता मानकर देखा और कईयों ने उसी शाम यह संकल्प लिया- अगला प्रस्ताव आए तो मैं सकारात्मक ढंग से देखूंगा क्योंकि, सबसे सुंदर फूल वहीं होता है…जहां तुम थोड़ा झुकते हो, थोड़ा समझते हो, और सबसे ज्यादा-प्यार करते हो।

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