मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों अशोकनगर के सुभाषगंज में विराजित हैं। यहां उनकी नित्य धर्म प्रभावना हो रही है। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारे पास क्या नहीं है, वो जिसके पास है, बस उसको जय जिनेंद्र करना शुरू कर दीजिए। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
अशोकनगर। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों अशोकनगर के सुभाषगंज में विराजित हैं। यहां उनकी नित्य धर्म प्रभावना हो रही है। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारे पास क्या नहीं है, वो जिसके पास है, बस उसको जय जिनेंद्र करना शुरू कर दीजिए। उन्होंने आगे कहा कि ये तो भगवान का संदेश है कि आत्मा अजर अमर अविनाशी है, ये तो शास्त्रों में लिखा है कि मैं भगवान बन सकता हूँ, महावीर स्वामी हुए थे, शास्त्रों में लिखी हुई बात को वाचना कोई महानता नहीं है, ये तो बालक भी वाच लेगा। जब तक ये शब्द लगा रहेगा कि भगवान ने कहा है कि मेरा स्वरूप ऐसा है, गुरु का स्वरूप ऐसा है, नहीं ये तो प्रारंभ है। पहली बात तो हमने संसार से कभी ऊपर उठने का भाव नहीं किया, ऐसा भाव आना भी बोधि दुर्लभ भावना है ये। पेड़ भी मरना नहीं चाहता, वह कहता है कि मैं जो हूँ, उसी में संतुष्ट हूँ।
परिणाम भी नहीं बनते कि इससे ऊपर उठने का कोई रास्ता है क्या? इसमें भी मात्र कुछ लोगों के बनते हैं नारकियों के- जब असहनीय दुख होते हैं तब वह छुटकारा पाने का भाव करता है। मनुष्यों में बनते हैं उनके जो दुखी हैं, परेशान हैं, गरीब है, बीमार है। जिनको सब प्रकार के सुख है, उनको कभी भाव आया कि इससे अच्छी भी जिंदगी है क्या? यह परिणाम होना दुर्लभ है क्योंकि जैसे ही सुख का उदय आया वह उसी में मस्त हो जाता है।
जैन दर्शन किसी भी चीज का निषेध नहीं करता
तुम दुखी होकर, परेशान होकर मंदिर आते हो, व्यापार नहीं चल रहा है, बीमार हो, जिंदगी में अंधेरा दिख रहा है तो मंदिर आते हो ये भगोड़े का लक्षण है, ये तो सब कर लेते है। मात्र दुख को दूर करने के लिए मंदिर आए हो तो देव शास्त्र गुरु तुम्हारे गुरु नहीं है मात्र डॉक्टर का रूप है। दुख के दिनों में मंदिर आना है, जैन दर्शन किसी भी चीज का निषेध नहीं करता, बस उसको सापेक्ष करता है। तुम कौन हो, ये सापेक्ष करके तुम तलवार भी चला सकते हो अन्यथा तुम तलवार छूने के भी अधिकारी नहीं। भगवान गुरु और शास्त्र हमेशा मील के पत्थर है, तुम्हें कहां जाना है, ये रास्ते बताते हैं। जो चीज तुम्हें नहीं मिल पाए उसकी कभी बुराई मत करना, नहीं तो जन्म जन्म तक उससे नीचे गिरोगे, कर सको तो प्रशंसा करना, नहीं कर सको तो निंदा मत करना।
अमीर को देखकर ही यदि तुम्हें गालियां देने का, कोसने का मन करता है तो जाओ तुम कभी अमीर नहीं बन पाओगे। इस भव में नहीं और अगले भव में भी नहीं। तुम गरीब हो तो अपने आप को कोसना लेकिन कहना कि मेरा एक पुण्य मेरा है कि मेरे पड़ोस में एक अमीर रहता है और यह जन्म-जन्म का पुण्यात्मा है इसलिए सबसे पहले मैं उसे जय जिनेंद्र करता हूँ, यदि यह भाव तुम्हारे अंदर आ रहा हो तो मैं भविष्यवाणी करता हूँ बहुत जल्दी तुम्हारी गरीबी दूर होने वाली है, 6 महीने के अंदर तुम्हारे दिन बदल जाएंगे।
दूसरों की सराहना से ही पुण्य सार्थक होंगे
तुम्हारा बहुत सिर दर्द हो रहा है और बाजू में कोई खर्राटे लेकर सो रहा है, आपको कैसा लग रहा है यदि दो झापड़ देने का मन कर रहा है, गुस्सा आ रहा है तो जाओ मेरे पास तुम्हारे सिरदर्द की कोई दवाई नहीं है, शांतिधारा में अपना नाम मत लिखाना। भाव लाना कि मैंने तो पाप किया है जो मेरा सर दर्द हो रहा है लेकिन मेरे बाजू में एक पुण्यात्मा सो रहा है, उसने जरूर पूर्वभव में वैयावृत्ति, रोगियों की दवा की होगी, मेरे द्वारा उसकी नींद खराब न हो जाए, आप नौ बार विचार करिए आपको धीरे-धीरे नींद आना शुरू हो जाएगी, एक मुहूर्त मात्र में परिवर्तन हो सकता है, इसी को बोलते हैं हमारे यहां संक्रमण, उत्कर्षण-अपकर्षण, उदीरणा।
यह विचार आप कायम रखिए मेरा विश्वास है कि माइग्रेन जो किसी डॉक्टर की दवाई से ठीक नहीं हुआ, मैं जो दवाई दे रहा हूँ, इससे ठीक हो जाएगा, अधिक होगा तो 6 महीने लग जाएंगे। तुम्हारे पास क्या नहीं है वो जिसके पास है, बस उसको जय जिनेंद्र करना शुरू कर दीजिए, उसके पुण्य की सराहना करना शुरू कर दीजिये, इसी का नाम तो भक्ति है। मैं भगवान नहीं हूँ, बन भी नहीं पा रहा हूँ लेकिन, पक्का है मैं बनूँगा, क्योंकि भगवान को देखकर मुझे खुशी होती है, आनंद आता है। तुम्हारा कोई दुर्गुण नहीं छूट रहा है तो जिसमें वह दुर्गुण नहीं है उसकी प्रशंसा करो, नियम से एकदम तुम्हारा दुर्गुण छूट जाएगा।













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