अतिशय क्षेत्र नांदणी अनेक ऋषि मुनियों की तपस्या से पावन प्राचीन तीर्थक्षेत्र है। यह अनेक लोगों का श्रद्धा स्थान है। पश्चिम महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिरोळ तहसील में स्थित है। जैन धर्म के विकास और संरक्षण के लिए भारतवर्ष में भट्टारक पीठों की निर्मिति हुई है। नांदणी से पढ़िए, यह खबर…
नांदणी। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद,कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने कहा कि अतिशय क्षेत्र नांदणी अनेक ऋषि मुनियों की तपस्या से पावन प्राचीन तीर्थक्षेत्र है। यह अनेक लोगों का श्रद्धा स्थान है। पश्चिम महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिरोळ तहसील में स्थित है। जैन धर्म के विकास और संरक्षण के लिए भारतवर्ष में भट्टारक पीठों की निर्मिति हुई है। इन सभी भट्टारक पीठों में स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक पट्टाचार्य महास्वामी मठसंस्थान नांदणी, करवीर (कोल्हापूर) यह आद्य पीठ है।
प्राचीन भारत के दिल्ली, पिंनगोंडी, जिनकंची और करवीर (नांदणी) ऐसी जिनसेन मठ की परंपरा चलती आ रही है। करवीर मठ संस्थान के कोल्हापुर, नांदणी, तेरदाळ और बेलगांव यह चार शाखापीठ है। इसलिए जिनसेन मठ की वास्तु अतिभव्य है। नांदणी स्थित मठ का इतिहास 1300 वर्ष पुराना है। नांदणी मठ के आधिपत्य में दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक के 743 गांव समाविष्ट हैं। इन सभी गांव में जैन धर्म के सभी धार्मिक महोत्सव, विधिविधान, पंचकल्याणक, धर्म का प्रसार एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक पट्टाचार्य महास्वामीजी के आदेश और आशीर्वाद से सानंद होते हैं। नांदणी (महाराष्ट्र)में हथिनी महादेवी (माधुरी) 35 वर्षों से रह रही है।
इतने सालों से नांदनी मठ की शान रही है माधुरी महादेवी हाथिनी, हमारे लिए वो केवल जानवर नहीं थी। वो थी हमारे मंदिर की शोभा, भक्ति की प्रतीक, हर पर्व, हर विधान, हर मंगल में उसकी गूंज थी। हिमांशु जैन,कानपुर उत्तरप्रदेश (आत्म चिंतन ) ने कहा कि 2014 का वो चातुर्मास जब आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज की दिव्य वाणी के साथ माधुरी ने भी अपनी उपस्थिति से पूरे वातावरण को और अधिक भक्तिमय बना दिया था। वो घंटी का मधुर ध्वनि, उसकी चपल चाल, और उसकी आंखों की ममता सब अब स्मृति बन जाएंगे। मनाली पाटणी, रांची ने कहा कि
’माधुरी हथीनी है तप की, धर्म की कहानी’ वो न थी केवल जंगल की रानी,
वो थी तप की, धर्म की कहानी।
मुनिराजों के चरणों में बैठी,
श्रद्धा से हर सेवा करती।
घंटी से पहले देती थी दस्तक,
जैसे करती हो आत्मा का वंदन।
नियम निभाती, दर्शन करती,
मानव से बढ़कर धर्म समझती।
गांव उसे निहारता था मान से,
घर का सदस्य था वो सम्मान से।
माधुरी के कारण मठ था रोशन,
वो थी जैन धर्म की सजीव झलकन।
लौटाओ उसे, जो हमारी सांसों में है,
जो आस्था की सबसे पवित्र आसों में है।
यह केवल मांग नहीं संकल्प है हमारा
धर्म जगेगा, जैन समाज अब चुप न रहेगा।













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