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त्याग, तप और तपस्या की प्रेरणास्रोत हैं आर्यिका पूर्णमति माताजी : जिनवाणी के स्वर में बहती है आत्मा की पुकार


आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी का जीवन जैन समाज ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के लिए आदर्श है। वे बताती हैं कि धर्म केवल व्रत और विधान का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की परख और अंतरतम से जुड़ने की साधना है। उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख यह है कि त्याग में ही सच्चा उत्थान है, और सेवा में ही आत्मकल्याण। पढ़िए उनके दीक्षा दिवस पर यह विशेष रिपोर्ट…


जब कोई बालिका छह वर्ष की उम्र में सांसारिक मोह से विरक्त होकर ब्रह्मचर्य की राह पकड़ लेती है, तो यह सामान्य घटना नहीं होती। और जब वही बालिका वर्षों की साधना और आत्मिक अनुशासन से तपस्वी संत के रूप में समाज को नई दिशा देने लगे, तो वह बन जाती है श्रद्धा, शक्ति और समर्पण की प्रतीक। ऐसी ही प्रेरणास्रोत हैं—आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी, जिनका जीवन तप, सेवा, शिक्षा, साहित्य और धर्म-प्रभावना का एक अद्वितीय समुच्चय है।

डूंगरपुर से दीक्षा तक: एक साधना यात्रा

आर्यिका पूर्णमति माताजी का जन्म 14 मई 1964 को राजस्थान के डूंगरपुर जिले में हुआ। उनके गृहस्थ जीवन के माता-पिता का नाम अमृतलाल जैन और रुक्मिणी देवी था। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति और आत्मिक झुकाव उनके स्वभाव में स्पष्ट दिखाई देता था। मात्र छह वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया, और 7 अगस्त 1989 में मध्यप्रदेश के कुंडलपुर में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षा प्राप्त कर ‘पूर्णमति’ नाम धारण किया। दीक्षा तिथि हिंदी माह के हिसाब से श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी थी। पूर्णमति नाम उनके जीवन की दिशा और साधना के शिखर को दर्शाता है।

तप, त्याग और साधना का प्रतिमान

आर्यिका माताजी का संपूर्ण जीवन जैन मुनि परंपरा की मर्यादाओं का कठोर पालन करते हुए बीता है। उनके दैनिक जीवन में संयम, स्वावलंबन और मौन की साधना प्रमुख रही है। वे न केवल एक साधिका हैं, बल्कि प्रवचन की ओजस्विनी वक्ता भी हैं, जिनकी वाणी श्रोताओं के मन में धर्म के प्रति गहन आस्था और आत्मपरिवर्तन की प्रेरणा जगाती है।

साहित्य की साधिका: सरलता में छिपा दर्शन

पूर्णमति माताजी का साहित्यिक योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने कई स्तुतिपाठ, विधान और ग्रंथों की रचना की है जिनमें प्रमुख हैं:

-कुंडलपुर बड़े बाबा विधान

-श्री शांतिनाथ विधान

-श्री पंचपरमेष्ठी विधान

-भक्तामर स्तोत्र, सहस्त्रनाम, एकीभाव, आत्मबोध शतक, मूक माटी शृंखला इत्यादि।

इन रचनाओं की भाषा अत्यंत सरल, भावप्रधान और धर्म-तत्वों से युक्त है, जो जटिल जैन दर्शन को भी सामान्य जनमानस तक पहुँचा देती हैं।

तीर्थ, धर्म और संस्कृति की वास्तुकार

प्रवचन और प्रेरणा का स्रोत

माताजी की प्रवचन शैली संयमित, सहज और विचारोत्तेजक है। वे मानव जीवन में संयम, क्षमा, अहिंसा और सादगी को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनका एक प्रमुख संदेश है—”धर्म केवल मंदिर की चौखट तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन की हर साँस में समाया हो।”

उनके प्रवचनों में आत्मा का स्वर है, और भजनों में भक्ति की लय। YouTube व सोशल मीडिया पर उनके कई प्रवचन और भजन आज भी लाखों लोगों की साधना का आधार हैं।

संघ निर्माण और चातुर्मास परंपरा

माताजी का ससंघ देशभर के अनेक क्षेत्रों में चातुर्मास करता रहा है। उन्होंने धार्मिक आयोजनों, ज्ञानगोष्ठियों और तप-प्रवृत्तियों के माध्यम से हजारों जिज्ञासुओं को मार्गदर्शन दिया है। उनके संघ में कई आर्यिकाएँ व आर्यिकाओं के शिष्य-शिष्याएं सक्रिय साधना में लगे हैं, जो समाज में संयम, सेवा और स्वावलंबन का संदेश फैला रहे हैं।

वर्तमान संदर्भ में उनकी आवश्यकता

आज जब समाज भौतिकता की दौड़ में आत्म-संवाद खो चुका है, ऐसे समय में आर्यिका पूर्णमति माताजी जैसे तपस्वियों की आवश्यकता और प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। वे केवल धार्मिक चेहरा नहीं, बल्कि उस आत्मिक चेतना की प्रतिनिधि हैं जो जीवन को भीतर से उजासित करती है।

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