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भावना की विशुद्धि से मोक्ष प्राप्ति तो अशुभ भावनाओं से परिभ्रमण: आचार्य श्री आर्जवसागर जी ने निर्मल भावनाओं की बताई महत्ता 


उदय नगर स्थित जिनालय में विराजित दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी द्वारा सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत बुधवार को श्रद्धालुओं को निर्मल भावनाओं की महत्ता का उपदेश दिया गया। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर…


इंदौर। उदय नगर स्थित जिनालय में विराजित दिगंबर जैनाचार्य श्री आर्जव सागर जी द्वारा सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत बुधवार को श्रद्धालुओं को निर्मल भावनाओं की महत्ता का उपदेश दिया गया। स्वप्निल जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि जैसे मंदिर में शिखर, शिखर पर कलश और कलश के साथ ध्वज का विशेष महत्व होता है, वैसे ही आत्मा की शुद्धि के लिए निर्मल भावना अत्यंत आवश्यक है। हमारे भावों की विशुद्धि ही भव को सुधारने का आधार है। यदि भाव निर्मल हों, तो आत्मा का कल्याण निश्चित है और यही शुभ भावनाएं; भव अर्थात् संसार से मुक्ति दिलाने वाली होती हैं। पूर्वाचार्यों ने कहा भी है कि भावना भव नाशनी और भावना भववर्धनी। अर्थात बुरी भावना से भव वर्धन होता है, वैसे ही शुभ भावना से भव बंधन कटते हैं और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। अतः हमें प्रयत्न करना चाहिए कि हमारे भावों में विचारों में कुटिलता नहीं आए। उत्तरोत्तर भावों में विशुद्ध बढ़े ताकि हम अपने सर्वाेच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सकें और मोक्ष रूपी मंजिल को पा सकें। जैन धर्म में बारह भावना, सोलह कारण भावना आदि का चिंतन है, आचार्य श्री ने बताया कि इस प्रकार 70 भावनाएं होती है।

हर व्यक्ति को को बार-बार इन भावनाओं का चिंतन करना चाहिए। इन भावनाओं का चिंतन करने से सांसारिक मोह-माया से वैराग्य उत्पन्न होता है और आध्यात्मिक विकास में सहायता मिलती है। जैसे अनित्य भावना में चिंतन किया गया है कि इस संसार की सभी वस्तुएं क्षण भंगुर है। वहीं अशरण भावना हमारे चिंतन को उस सच्चाई की ओर ले जाती है कि हमरी मृत्यु के समय कोई भी व्यक्ति हमारी रक्षा नहीं कर सकता इसी प्रकार इन भावनाओं के चिंतन से हमारे संयम की भावना दृढ़ता को प्राप्त हुआ करती है।

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