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सरकार तोड़ रही है स्थाई अधिकारियों का मनोबल : आरएएस अधिकारियों पर गुरुजी चलाएंगे हुक्म


इस बार शिक्षा विभाग के व्याख्याओं और प्राचार्य को अल्पसंख्यक मामलात विभाग में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और अतिरिक्त निदेशक जैसे प्रशासनिक पदों पर बिठा दिया है,जिससे विभागीय स्थाई अधिकारियों में गहरा असंतोष व्याप्त है। जयपुर से पढ़िए खबर…


जयपुर। सवाल उठ रहे हैं अफसरशाही की उस छिपी हुई सत्ता पर ,जहां नियम सिर्फ आम कर्मचारियों के लिए हैं। रसूखदारों गुरुओं के लिए नहीं। बिना किसी सार्वजनिक विज्ञप्ति के गुरुजी बन गए अतिरिक्त निदेशक और जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा। इनसाइडर पॉलिटिक्स और विभागीय मैनेजमेंट का यह सिर्फ एक विभाग का मामला नहीं है। यह प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ पर चोट है। ‘रिटायरमेंट से पहले रिटायरमेंट जैसा’ वीआईपी आरामगाह विभाग लेने के लिए गुरुजी ने अपनी संपूर्ण राजनीतिक ताकत झोंककर ये पद हथियाने काम किया है। जहां न जवाबदेही है, न जवाब बस उड़ती है तो नियम-कानूनो की धज्जियां राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिनियुक्तियों पर रोक की बात बार-बार दोहराई जाती है,लेकिन अल्पसंख्यक मामलात विभाग में इस परंपरा पर कोई असर नहीं दिख रहा है। इस बार शिक्षा विभाग के व्याख्याओं और प्राचार्य को अल्पसंख्यक मामलात विभाग में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और अतिरिक्त निदेशक जैसे प्रशासनिक पदों पर बिठा दिया है,जिससे विभागीय स्थाई अधिकारियों में गहरा असंतोष व्याप्त है।

प्रतिनियुक्ति पर लगे एक बड़े अफसर के इशारे से चलता विभाग

अल्पसंख्यक मामलात विभाग में प्रतिनियुक्ति पर लगे एक अफसर ने तो विभाग में ऐसा ‘नेक्सस’ बना लिया है, जो न केवल नई नियुक्तियों को प्रभावित करता है, बल्कि नियम विरुद्ध चल रहे इस पूरे सिस्टम को ढंकने का काम कर रहा है। जिसके कारण ही विभाग में 2021 के बाद स्थाई अधिकारियों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई। जो थे उनमें से भी कुछ अधिकारियों ने विभाग ही छोड़ दिया। इतना ही नहीं वह कई बार तो वह अल्पसंख्यक वर्ग के विभिन्न समुदायों से आने वाली मांगों पर कोई कार्रवाई ही नहीं करता है। जिससे कारण विभाग के प्रति उनमें भी रोष व्याप्त है।

’स्थाई अधिकारियों की भर्ती पर उठने लगे प्रश्न’ 

नाम नहीं छापने की शर्त पर एक जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी ने बताया कि वर्ष 2018 में तत्कालीन सरकार के निर्णय के तहत इस विभाग में प्रतिनियुक्तियों को समाप्त करने के लिए आरएएस परीक्षा से चयनित 40 अधिकारियों को वर्ष 2021 में नियुक्त किया गया था। इसके बावजूद विभाग में प्रतिनियुक्ति की परंपरा खत्म नहीं हो सकी। 2023 में सत्ता परिवर्तन के बाद लगातार सेवा नियमों में संशोधन और प्रतिनियुक्ति समाप्ति की मांग कर रहे हैं। कार्यक्रम अधिकारी ने बताया कि जहां स्थायी पदाधिकारी मौजूद हैं, वहां प्रतिनियुक्तियों को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए लेकिन, अल्पसंख्यक विभाग में इसका उलटा हो रहा है। इससे राजस्थान प्रशासनिक सेवा से चयनित अधिकारियों का मनोबल टूट रहा है, वहीं स्कूलों को भी क्षति पहुंच रही है।

विभाग ने जताई नाराजगी

शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति को लेकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा से चयनित अल्पसंख्यक मामलात विभाग में कार्यरत जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और कार्यक्रम अधिकारियों के द्वारा कड़ी आपत्ति दर्ज करवाने पर बढ़ते हुए विरोध को देखते हुए 15 जुलाई को विभाग के निदेशक मातादीन मीना ने आदेश जारी किया कि बिना निदेशक की अनुमति के किसी भी कार्मिक को कार्यमुक्त अथवा कार्य ग्रहण नहीं करवाया जाए।

18 गुरुजी व प्रबोधकों को दी प्रशासनिक जिम्मेदारी

गत 13 जुलाई को जारी आदेशों के तहत राज्यभर में 14 शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। इनमें से डूंगरपुर, करौली, बूंदी, चूरू, बाड़मेर,राजसमंद, झालावाड़ में प्राचार्य और झुंझुनूं, नागौर, चित्तौडगढ़, बांसवाड़ा और बारां में व्याख्याताओं को जिला अल्पसंयक कल्याण अधिकारी बना दिया गया। जयपुर (विराट नगर ब्लॉक) और अलवर (बसेठ) के प्राचार्य को अतिरिक्त निदेशक पद का कार्यभार सौंपा गया। इसके बाद 14 जुलाई को निदेशक प्रारंभिक शिक्षा विभाग ने चार शिक्षकों को फिर प्रतिनियुक्ति पर लगा दिया। इसमें नागौर और बाड़मेर में तो प्रबोधक और दौसा में शिक्षक लेवल प्रथम को ही कार्यक्रम अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है।

आखिर कब तक होता रहेगा इन स्थाई अधिकारियों के साथ पक्षपात

राजस्थान समग्र जैन युवा परिषद् के अध्यक्ष जिनेंद्र जैन ने बताया कि जब राजस्थान सरकार अल्पसंख्यक मामलात विभाग के कार्यक्रम अधिकारी को आहरण वितरण अधिकार दे चुकी है तो फिर प्रतिनियुक्ति की आवश्यकता ही खत्म हो जाती है। दूसरी तरफ सरकार विभाग में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति के आदेश निकाल रही है। जिसमें एक भी अल्पसंख्यक नहीं, जो एक बड़ा ही अचरज का विषय है। जिसके कारण राजस्थान प्रशासनिक परीक्षा से चयनित जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और कार्यक्रम अधिकारियों का अब मनोबल टूटने लगा है। वे निराश होकर प्रतियोगी परीक्षा देकर अन्य विभागों में जा चुके है या जाने की तैयारी कर रहे है या फिर प्रतिनियुक्ति का जुगाड़ लगाकर दूसरे विभागों में जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। जैन ने बताया कि जब इस तरह से ही विभाग को पंगु बनाना था तो फिर राजस्थान प्रशासनिक सेवा में नई सेवा को जोड़ा ही क्यों प्रतिनियुक्ति के भरोसे ही विभाग को चलाते रहते। आज इसका खामियाजा अल्पसंख्यक वर्ग के सभी समुदायों को भुगतना पड़ रहा हैं क्योंकि, उनको विभाग की योजनाओं का लाभ राज्य और केंद्र सरकार की मंशा के अनुरूप लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो एक बड़ा चिन्ता का विषय है। राजस्थान समग्र जैन युवा परिषद् द्वारा सरकार के समक्ष ब्लॉक एवं संभाग तथा निदेशालय स्तर पर नए पद सृजित करने के लिए निवेदन किया था लेकिन अपने निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर एक प्रतिनियुक्ति पर लगे आला अफसर ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जबकि राज्य और केन्द्र सरकार इस विषय में सकारात्मक थी स इससे साफ जाहिर होता है कि विभाग के स्थाई अधिकारियों के खिलाफ एक सोची समझी राजनीति खेली जा रही है जिसके कारण इन स्थाई अधिकारियों का मनोबल टूट-टूट कर चूर-चूर हो रहा है। अब आशा की किरण केवल मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव ही रहे है, जो इनकी पीड़ा और दर्द को समझ सकते है।

क्या अल्पसंख्यक मंत्री सुनेगे स्थाई अधिकारियों की पीड़ा

वैसे तो अल्पसंख्यक मामलात विभाग के मुखिया की कमान राजस्थान के जननायक माननीय मुख्यमंत्री भजनलाल जी शर्मा संभाल रहे है लेकिन, राजस्थान प्रशासनिक परीक्षा से चयनित ये जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और कार्यक्रम अधिकारियों को उनके द्वारा समय मांगने पर उनके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा समय प्रदान नहीं किया जा रहा है। जिसके कारण अब उनका धैर्य जवाब देने लगा है। चार वर्ष अपने विभाग में कार्य करने के बाद भी उन्हें विभाग के संचालन के लायक नहीं समझना बड़ा चिंता का विषय है। अल्पसंख्यक वर्ग के विभिन्न संगठनों ने मीडिया के माध्यम से निवेदन किया कि मुख्यमंत्री को विभाग के मुखिया होने के नाते विभाग के स्थाई अधिकारियों को समय प्रदान कर उनकी पीड़ा को सुनकर उचित समाधान करना चाहिए।

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