आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस पर 13 फीट गुरु मंदिर का लोकार्पण हुआ। जिसका सौभाग्य संतोष कुमार नितिन कुमार सबदरा परिवार को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज के निर्देशन में लोकार्पण हुआ। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस पर 13 फीट गुरु मंदिर का लोकार्पण हुआ। जिसका सौभाग्य संतोष कुमार नितिन कुमार सबदरा परिवार को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज के निर्देशन में लोकार्पण हुआ, जो बहुत ही भव्य अलौकिक यह मंदिर लगभग 13 फीट का है। जिसे योगेश जैन जबलपुर के निर्देशन में तैयार किया गया है। इसमें लगभग 20 कारीगरों ने मिलकर तैयार किया है। इसे बनाने में डेढ़ महीने का समय लगा। योगेश जैन ने बताया कि आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज की प्रेरणा से इसका निर्माण किया गया है। इसमें क्रिस्टल और अमेरिकन डायमंड का उपयोग किया गया है।
लोकार्पण से पूर्व सर्वप्रथम आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रथम समाधि दिवस को आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में मनाया गया। सर्वप्रथम मूलनायक शांतिनाथ भगवान के समक्ष श्रीजी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई। इसके उपरांत जिनसहस्त्र नाम के 1008 कलश से अभिषेक किया गया। शांतिधारा का सौभाग्य सुरेशकुमार सिद्धार्थ कुमार बाबरिया परिवार रामगंजमंडी एवं सुनील कुमार विवान सुरलाया परिवार को प्राप्त हुआ।
गुरु पूजा के लिए बनाया गया आकर्षक मांडना
अभिषेक शांतिधारा उपरांत विशेष थाल सजाकर आचार्य श्री विराग सागर का पूजन किया गया जिसे संगीत लहरियों के बीच मुनिश्री प्रांजल सागर महाराज ने कराया। जो भक्ति से ओतप्रोत रही। सभी का उत्साह भरपूर था पूजन के शुभारंभ से पूर्व मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने मंगलाचरण किया। इसके उपरांत विशेष थाल सजाकर सभी समूह बच्चों ने क्रम से भक्ति नृत्य करते हुए भाव विभोर होकर अष्ट द्रव्य समर्पित किए। पूजन के लिए बनाया गया मांडना बहुत ही आकर्षक था। इस अवसर पर आचार्य श्री के पद प्रक्षालन का सौभाग्य दिलीप कुमार अरुण कुमार विनायका परिवार को प्राप्त हुआ।
तीर्थंकर कहते हैं कि मरण के लिए पुरुषार्थ समाधि है
इस अवसर पर आचार्य श्री ने आचार्य श्री विराग सागर महाराज के प्रति अपनी भावांजली दी। उन्होंने उन्होंने समाधि के विषय को समझाते हुए कहा कि मरण को मिटाने को समाधि कहते हैं। उन्होंने इसका विशेष रूप से इसका भावार्थ बताते हुए कहा कि तीर्थंकर कहते हैं कि मरण के लिए पुरुषार्थ समाधि है। समाधि का अर्थ लक्ष्य तक पहुंचना है। उन्होंने कहा हम बार-बार मर चुके हैं लेकिन, एक बार भी समाधि नहीं हुई अगर अवसर मिले समझने का तो निर्णय करना चाहिए। जैन दर्शन कहता है कि भगवान प्राप्त किसी को नहीं होते मार्ग है भगवान बनने का कि हम अपनी समाधि करें।
समाधि की यह अवस्था दुर्लभ एवं मुश्किल होती है
मुनिश्री ने कहा कि आचार्य श्री ने अनेकों समाधि कराई है। आचार्य श्री मोह से हटाकर त्याग में प्रवेश कराकर कुशलता से समाधि कराते थे। उनकी समाधि के समय नियति ने उन्हें पूरा अवसर दिया संपूर्ण जागृत अवस्था में उन्होंने समाधि की यह अवस्था दुर्लभ एवं मुश्किल होती है। उन्होंने भगवती आराधना का पालन किया निर्णय किया और अपने पद त्याग दिया और अपना पद दूसरों को दिया यह निर्णय कठिन होता है। उन्होंने पद का त्याग ही नहीं किया व्यवस्था भी बना दी की पद को कौन संभालेगा।
हम धर्म का आचरण करने को तैयार हैं
मुनिश्री ने कहा कि गुरु के लिए सब बराबर होते हैं लेकिन, एक को चुनना होता है। गुरुदेव हम सबको एक साथ रहना सिखाया है। आचार्य श्री ने बहुत कुछ दिया। इसी कारण पंचम काल में हम निर्बाध रूप से हम धर्म का आचरण करने को तैयार हैं। जो धर्म की गहराई से नहीं जुड़ सकता वह समाधि से नहीं जुड़ सकता त्याग आपको धर्म से जोड़ता है और सुख से जोड़ता है।
गुरु गुरु होते हैं वह शिष्य को बहुत कुछ दे जाते हैं
गुरु गुरु होते हैं वह शिष्य को बहुत कुछ दे जाते हैं लेकिन शिष्य गुरु को कुछ भी नहीं दे पाता है। गुरुदेव ने मुझे सिखाया समझाया गुरुदेव ने हमें बनाने में बहुत मेहनत की। गुरुवर ने इतना संभाला इतना संभाला वह ज्ञान देते गए हम लेते गए और चार महीने में ही गुरुदेव ने हाथ में पिच्छि दे दी। गुरु के उपकार को हम सदियों तक भी नहीं चुका सकते उनकी शिक्षा और उनकी स्मृति जीवन में उतारी जा सकती है।













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