प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को राजधानी दिल्ली में आयोजित भव्य कार्यक्रम में जैन मुनि आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज की 100वीं जयंती के अवसर पर उनके शताब्दी समारोह का शुभारंभ किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने आचार्य विद्यानंद जी को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का आधुनिक प्रकाश स्तंभ बताते हुए उनकी शिक्षाओं को भारत की सेवा, संयम और करुणा प्रधान संस्कृति से जोड़कर याद किया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को राजधानी दिल्ली में आयोजित भव्य कार्यक्रम में जैन मुनि आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज की 100वीं जयंती के अवसर पर उनके शताब्दी समारोह का शुभारंभ किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने आचार्य विद्यानंद जी को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का आधुनिक प्रकाश स्तंभ बताते हुए उनकी शिक्षाओं को भारत की सेवा, संयम और करुणा प्रधान संस्कृति से जोड़कर याद किया। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने आचार्य विद्यानंद जी महाराज के सम्मान में विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्का भी जारी किया। प्रधानमंत्री को इस अवसर पर ‘धर्म चक्रवर्ती’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
सेवामय जीवन ही धर्ममय जीवन है
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि आचार्य विद्यानंद महाराज कहते थे कि जीवन तभी धर्ममय हो सकता है, जब जीवन स्वयं ही सेवामय बन जाए। यह विचार न सिर्फ जैन दर्शन की मूल भावना से जुड़ा है, बल्कि भारत की चेतना का भी आधार है। भारत सेवा प्रधान देश है, मानवता प्रधान देश है।”
प्राकृत भाषा को शास्त्रीय दर्जा
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आचार्य श्री ने प्राकृत भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि प्राकृत भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है, जो भगवान महावीर के उपदेशों की भाषा रही है। लेकिन अपनी संस्कृति की उपेक्षा करने वालों के कारण यह भाषा सामान्य प्रयोग से बाहर हो गई थी। हमने आचार्य श्री जैसे संतों के प्रयासों को देश का प्रयास बनाया और प्राकृत को ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा दिया। प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि भारत सरकार भारत की प्राचीन पाण्डुलिपियों को डिजिटाइज करने का अभियान चला रही है ताकि आने वाली पीढ़ियों को हमारी समृद्ध विरासत से जोड़ा जा सके।
विकास और विरासत साथ-साथ
प्रधानमंत्री ने कहा कि “हमें विकास और विरासत को साथ लेकर चलना है। इसी सोच के तहत हम भारत के सांस्कृतिक स्थलों और तीर्थ स्थानों का भी विकास कर रहे हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 28 जून 1987 को ही आचार्य विद्यानंद जी को ‘आचार्य’ की उपाधि प्राप्त हुई थी, और यह दिन जैन समाज ही नहीं, समस्त भारत के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का ऐतिहासिक क्षण बन गया।
अहिंसा ही भारत का मार्गदर्शन रही
प्रधानमंत्री ने भारत की शाश्वत सभ्यता और ऋषि-मुनियों की परंपरा को स्मरण करते हुए कहा कि जब दुनिया में हजारों वर्षों तक हिंसा से हिंसा शांत करने के प्रयास होते रहे, तब भारत ने दुनिया को अहिंसा की शक्ति का बोध कराया। हमारा चिंतन अमर है, दर्शन अमर है, और आचार्य विद्यानंद जी जैसे संत उस दर्शन के आधुनिक युग में प्रतीक हैं।
जैन धर्म की ध्वजा लहराई
इस मौके पर श्रवबेलगोला मठ के स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी ने कहा कि आज हम सबके लिए बहुत खास दिन थे। आचार्य विद्यानंद जी तपस्वी और ज्ञानी संत थे। उन्होंने हजारों मंदिरों की जीर्णोद्धार कराया और जैन धर्म को दुनिया भर में फैलाया। उन्होंने भगवान महावीर और भगवान बाहुबली के संदेशों को लोगों तक पहुंचाया। विद्यानंद जी ने दक्षिण भारत से उत्तर भारत आकर जैन धर्म का ध्वज लहराया था। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की भी प्रशंसा करते हुए कहा कि मोदी जी भारत को विश्व गुरु का स्थान दिलवाया है।













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