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आचार्य निर्भय सागर का कथन अहंकारी नहीं भक्त बनो : आचार्यश्री ने समाज के विभिन्न रूपों से करवाया परिचय                  


संत आचार्यश्री निर्भय सागरजी संघ का सहित बडे़ मंदिर महरौनी में 10 दिवसीय प्रवास रहा। प्रतिदिन प्रातः आचार्यश्री के मंगल प्रवचन एवं शाम को शंका समाधान का कार्यक्रम संयोजित किया गया। शुक्रवार को भी यहां धर्म सभा हुई। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने उनकी देशना सुन धर्मलाभ अर्जित किया। महरौनी से राजीव सिंघई की पढ़िए, यह खबर…


महरौनी। आचार्यश्री निर्भय सागरजी संघ का सहित बडे़ मंदिर महरौनी में 10 दिवसीय प्रवास रहा। प्रतिदिन प्रातः आचार्यश्री के मंगल प्रवचन एवं शाम को शंका समाधान का कार्यक्रम संयोजित किया गया। शुक्रवार को भी यहां धर्म सभा हुई। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने उनकी देशना सुन धर्मलाभ अर्जित किया। आचार्यश्री निर्भयसागरजी ने धर्मसभा में उपदेश देते हुए कहा कि समाज अनेक प्रकार के होते हैं। जैसे स्वार्थी समाज, परमार्थी समाज, स्वस्थ समाज, धार्मिक समाज, भक्त समाज, व्यसनी सम, हिंसक समाज, अहिंसक समाज और उपकारी समाज। हमें उपकारी, अहिंसक, स्वस्थ समाज का निर्माण करना है। यही जैन धर्म का मूल उद्देश्य है। जैन समाज स्वयं परमार्थी, उपकारी, धार्मिक और अहिंसक समाज है। परस्पर उपकार करने वाला समाज स्वस्थ समाज कहलाता है। परस्परता के सूत्र में बंध जाने पर परोपकार की भावना पैदा होती है और संघर्ष समाप्त हो जाता है। जो समाज भगवान की भक्ति करता है, परिवार और समाज की सेवा में लीन रहता है। वह भक्त समाज कहलाता है।

विनय को मोक्ष का द्वार कहा है

आचार्यश्री ने धर्मसभा में कहा कि भक्ति रूपी चाबी से मुक्ति महल में लगा ताला खुल जाता है। विनय करने से मोक्ष महल में लगा हुआ दरवाजा खुलता है, इसलिए विनय को मोक्ष का द्वार कहा है। भक्त और भगवान के बीच संबंध जोड़ने में भक्ति सेतु का काम करती है, भक्ति आत्म उत्थान का सूत्र है। परोपकार समाज उत्थान का सूत्र है। सेवा परिवार के उत्थान का सूत्र है। आचार्य श्री ने कहा कि जिस व्यक्ति के अंदर भक्ति की हवा भरी होती है। वह वालीबाल के समान होता है। उसे लोग गिरने नहीं देते बल्कि हाथों हाथों में लिए रहते हैं, लेकिन जिसके अंदर अहंकार की हवा भरी होती है। वह फुटबाल के समान होता है उसे कोई हाथ नहीं लगाता है। फुटबाल के समान अहंकारी व्यक्ति का स्थान पैरों के नीचे होता है। वह संसार की ठोकर खाता रहता है।

ललितपुर तब तक ना छोड़िए जब तक ना हो उद्धार

अपने जीवन को फुटबाल नहीं वालीबाल बनाना चाहिए। तभी समाज में इज्जत होगी और स्वर्ग की ओर आत्मा की गति होगी। संसारी प्रत्येक मानव को जन्म जरा मृत्यु रोग अनादि काल से लगे हुए है। प्रत्येक संसारी प्राणी आहार, भय, मैथुन और अपरिग्रह संज्ञा से पीड़ित है। इस पीड़ा को धर्म रूप औषधि से दूर किया जा सकता है। आचार्य श्री ने बुंदेलखंड में चलने वाली कहावत के अनुसार कहा कि झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार, ललितपुर तब तक ना छोड़िए जब तक ना हो उद्धार। पूजा, भक्ति एवं आरती की परंपरा अनादि कालीन है। प्रातः काल देवकी पूजा करना चाहिए। दोपहर में गुरु को आहार दान रूपी भक्ति करना चाहिए और शाम को संध्याकाल में धर्मशास्त्र की आरती करना चाहिए। यही त्रिकाल वंदना है। भक्ति है और पूजा है। इसको करने वाला तीन लोक का नाथ बन जाता है। प्रवचन के बाद आचार्य संघ की आहार चर्या हुई। सामायिक करने के बाद आचार्य संघ का ललितपुर की ओर चातुर्मास के लिए मंगल विहार हुआ।

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