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जैन धर्म विवेक और आगम का धर्म है : मुनिश्री विभंजनसागरजी ने शांतिधारा का उचित तरीका बताया


मुनि श्री विभंजनसागर जी और मुनि श्री विश्वज्ञेय सागर जी मुनिराज ससंघ’का इंदौर में प्रवास हैं। वैशाली नगर उनके प्रवचन जारी है। इसमें बड़ी संख्या में दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालुगण इसका धर्म लाभ उठा रहे हैं। इंदौर से पढ़िए, यह खबर…


इंदौर। समाधिस्थ गणाचार्य श्री विरागसागर जी के शिष्य आचार्य श्री विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री विभंजनसागर जी और मुनि श्री विश्वज्ञेय सागर जी मुनिराज ससंघ’का इंदौर में प्रवास हैं। वैशाली नगर उनके प्रवचन जारी है। इसमें बड़ी संख्या में दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालुगण इसका धर्म लाभ उठा रहे हैं। मुनिश्री विभंजनसागरजी ने अपनी धर्मसभा में कहा कि धार्मिक क्रिया जो आप करते हो वैसा ही दूसरा व्यक्ति भी करता है, आप सही हो ,आप दूसरे को गलत नहीं बता सकते हो। कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में महिला अभिषेक और पंचामृत अभिषेक होता है। वहां सब करते हैं। गलत कुछ भी नहीं है। जैन धर्म विवेक और आगम का धर्म है। आपको प्रत्येक धार्मिक क्रिया उठना, बैठना, खाना, पीना, सोना, जागना चलना जो भी क्रिया करनी है, विवेक पूर्वक करना चाहिए।

शांतिधारा के बारे में स्पष्ट विवेचना में बताया कि शांतिधारा मस्तक पर करना चाहिए। आजकल मंदिरों में व्यक्ति कहते हैं कि शांतिधारा यंत्र पर करो, भगवान के चरणों पर करो ,किंतु सोचने की बात है कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा भगवान की होती है। सूर्य मंत्र ,अंक न्यास ,भगवान के होते हैं। यंत्र के नहीं किए जाते हैं। इसी कारण शांति धारा भगवान पर करना आगम अनुसार है।

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Shreephal Jain News

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