सर्वार्थसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि “रिश्ते” — यह शब्द जितना सरल लगता है, उसका अर्थ उतना ही गहरा है। हर रिश्ता — चाहे वह माँ-बेटे का हो, पति-पत्नी का, दोस्ती का या भाई-बहन का — विश्वास की नींव पर टिका होता है। पढ़िये अभिषेक अशोक पाटील की रिपोर्ट….
भोपाल। सर्वार्थसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि “रिश्ते” — यह शब्द जितना सरल लगता है, उसका अर्थ उतना ही गहरा है। हर रिश्ता — चाहे वह माँ-बेटे का हो, पति-पत्नी का, दोस्ती का या भाई-बहन का — विश्वास की नींव पर टिका होता है।
हम सभी चाहते हैं कि हमारे अपने हमसे जुड़े रहें, हमारी परवाह करें, हमें समय दें। और जब कोई हमारे करीब होता है, तो स्वाभाविक रूप से हमारे मन में उस पर हक़ जताने की भावना आती है। यह हक़ क्या है? यह हक़ है — उसकी फिक्र करने का, उसे समझने का, और ज़रूरत पड़ने पर उसे सही राह दिखाने का।
लेकिन जब यही हक़ शक में बदल जाता है, तो वही रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगता है। शक — यह एक ऐसा ज़हर है, जो सबसे मीठे रिश्ते को भी कड़वा बना देता है। जहाँ शक होता है, वहाँ संवाद खत्म हो जाता है। और जहाँ संवाद खत्म होता है, वहाँ दिलों की दूरी बढ़ने लगती है।
हमें यह समझना होगा कि हक़ और शक के बीच बहुत बारीक अंतर होता है।
हक़ जोड़ता है, शक तोड़ता है।
हक़ अपनापन लाता है, शक परायापन।
यदि हमें अपने रिश्तों को मजबूत बनाना है, तो सबसे पहले अपने मन के संदेहों को साफ करना होगा।
बात कीजिए, समझाइए, समझिए — लेकिन मन में बैठा शक मत पालिए।
क्योंकि जब हम किसी से सच्चा प्यार करते हैं, तो हमें उस पर भरोसा भी करना चाहिए।
और जहाँ भरोसा होता है, वहाँ शक की कोई जगह नहीं होती।
तो आइए, आज हम सब एक संकल्प लें —
अपने हर रिश्ते में हक़ ज़रूर रखें — लेकिन शक कभी नहीं।
विश्वास को बनाएं अपनी नींव — और प्रेम को अपना स्तंभ।













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