जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को आ रहा है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने के कार्यक्रम किए जाते हैं। भगवान धर्मनाथ जी के मोक्ष कल्याणक को लेकर सकल जैन समाज में धार्मिक उल्लास है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित रिपोर्ट…
इंदौर। जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। नगर सहित देश के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान धर्मनाथ की भव्य भक्ति आराधना का दौर रहेगा। धर्म के प्रकाश से विश्व को दिव्य प्रकाश प्रदान करने वाले 15वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल तृतीया के दिन रत्नपुर के राजा भानु की पट्टमहिषी सुव्रतादेवी की रत्न कुक्षी से हुआ। प्रभु के जन्म से इस धतरी पर सर्वत्र हर्ष, आनंद और शांति का प्रार्दुभाव हुआ। पुत्र के युवावस्था मंे प्रवेश करने पर माता-पिता ने अनेक राजकन्याओं के साथ उनका विवाह किया। भारी समारोह रचकर पिता ने धर्मनाथ को राजगद्दी पर प्रतिष्ठित किया। भगवान धर्मनाथ जी के धर्म शासन में अधर्म का अंधकार विलुप्त होकर विलीन हो गया। कालांतर में राज पद का परित्याग कर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन श्री धर्मनाथ जी ने प्रव्रज्या में प्रवेश किया। प्रभु आत्म साधना में निमग्न होकर कर्म रिपुओं का हनन करने लगे। मात्र दो वर्ष की अवधि में कर्म रिपुआंे को परास्त कर पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रभु केवली बने। धर्मतीर्थ की स्थापना कर तीर्थंकर कहलाए। अरिष्ट आदि 43 प्रमुख शिष्य प्रभु के गणधर थे। प्रभु के धर्म परिवार में 64 हजार श्रमण, 62 हजार 400 श्रमणियां, दो लाख 44 हजार श्रावक एवं 4 लाख 13 हजार श्राविकाएं थीं। पांचवे वासुदेव पुरुष सिंह एवं बलदेव सुदर्शन प्रभु के अनन्य उपासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन सम्मेद शिखर पर्वत से प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया। तीसरे चक्रवर्ती मघवा एवं चौथे चक्रवर्ती सनतकुमार भी प्रभू धर्मनाथ के शासनकाल में ही हुए।
भगवान के चिन्ह का महत्व
वज्र धर्मनाथ तीर्थंकर का चिन्ह वज्र है। वज्र इंद्र देव का शस्त्र है। इसलिए इंद्र को वज्रपाणि कहा जाता है। वज्र कठोरता का प्रतीक है। वज्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कष्टों में भी वज्र के समान दृढ़ रहना चाहिए। धर्म पालन में दृढ़ रहना चाहिए। अज्ञान, मोह और मिथ्यात्व पर वज्र प्रहार करने से ही सच्चे धर्म की प्राप्ति होती है। धर्मनाथ भगवान का चिन्ह धर्म-मार्ग पर वज्र की तरह दृढ़ होकर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।













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