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जैन समाज में बढ़ता दिखावा उपेक्षित निर्धन वर्ग एक चिंतन: वास्तविक सेवा, जो धर्म का सार है। वह कहीं पीछे छूटी 


धर्म का उद्देश्य केवल रीति-रिवाजों और आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका मुख्य लक्ष्य समाज के हर व्यक्ति को सन्मार्ग की ओर ले जाना है। विशेषकर उस व्यक्ति को जो स्वयं वहां तक नहीं पहुंच सकता। जैन धर्म का सार ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ में है, न कि वैभव प्रदर्शन में। समय की मांग है कि हम समाज के उस उपेक्षित वर्ग की सुध लें। पलवल से पढ़िए, जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम के संयोजक नितिन जैन की कलम से यह अभिव्यक्ति…


पलवल। आज जैन समाज एक ओर जहां भव्य आयोजनों, विशाल रथयात्राओं, चमचमाते मंचों और अमूल्य भेंटों के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग उपेक्षा और उपेक्षा भाव का शिकार होता जा रहा है। ये वर्ग है, निर्धन, पिछड़ा और साधनों से वंचित जैन परिवारों का, जो न तो मंचों पर स्थान पाते हैं, न ही किसी संस्था या साधु-संत की दृष्टि में उनके लिए कोई योजना है।

दिखावे की दौड़ः धर्म या प्रदर्शन ?

जैन धर्म का मूलभूत संदेश तप, संयम, त्याग और अहिंसा है। भगवान महावीर ने न केवल राजमहलों को त्यागा, बल्कि हर जीव मात्र की पीड़ा को समझने का मार्ग दिखाया। परंतु वर्तमान समय में धार्मिक आयोजनों में यह मूल भावना कहीं खो सी गई है। अब धर्म के नाम पर मंचों पर होने वाला दिखावा अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। महंगे परिधान, आभूषणों की होड़, चढ़ावों की बोली और समाज सेवा के नाम पर फोटो खिंचवाने की ललक। वास्तविक सेवा, जो धर्म का सार है। वह कहीं पीछे छूट गई है। निर्धन जैन परिवार, जो साधनों के अभाव में अपने बच्चों को धर्म की शिक्षा तक नहीं दिला पाते, जो तीर्थ यात्रा के लिए तरसते हैं, जो एक साधु के दर्शन को तरसते हैं। उनके लिए कोई आयोजन नहीं होता।

उपेक्षित निर्धन वर्ग किसकी जिम्मेदारी?

वर्तमान परिदृश्य में जैन समाज का निर्धन वर्ग कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा हैः-

ऽ शैक्षिक पिछड़ापनः आर्थिक संकट के कारण कई बच्चे उचित शिक्षा से वंचित हैं।

ऽ धार्मिक दूरीः धनाभाव के कारण मंदिर, तीर्थ और आयोजनों में उनकी भागीदारी नगण्य है।

ऽ आर्थिक उपेक्षाः किसी संस्था या संगठन द्वारा इस वर्ग के लिए कोई स्थायी सहायता योजना नहीं चलाई जा रही।

ऽ मानसिक पीड़ाः समाज द्वारा उपेक्षा का भाव, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है, जिससे यह वर्ग खुद को समाज से कटता हुआ महसूस करता है।

साधु-संत और संस्थाएंः क्यों हैं मौन?

समाज के धर्मगुरुओं और संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे समाज के हर वर्ग तक पहुंचे, विशेषकर उस वर्ग तक जो सबसे कमजोर है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि अधिकांश साधु-संत केवल धनाढ्य वर्ग के यहां ही ठहरते हैं, वहीं धर्म प्रवचनों और आयोजन की योजना बनती है। निर्धन वर्ग तक कोई धर्मगुरु न पहुंचता है, न उनकी पीड़ा को सुनता है।

समाधानः कुछ आवश्यक पहल

1. सामूहिक सेवा योजनाः समाज की हर संस्था को कम से कम 20ः संसाधन निर्धन वर्ग की शिक्षा, चिकित्सा और धार्मिक सहभागिता हेतु समर्पित करने चाहिए।

2. समावेशी आयोजनों की शुरुआतः आयोजनों में निर्धन परिवारों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए दृ उन्हें विशेष आमंत्रण दिया जाए, यात्रा और आवास की व्यवस्था की जाए।

3. जागरूकता अभियानः धर्मगुरु और वक्ता अपने प्रवचनों में समाज के भीतर के भेदभाव पर बात करें और इसे मिटाने का मार्ग दिखाएं।

4. साधुओं की जिम्मेदारीः साधुओं को केवल भव्य धर्मशालाओं में न रहकर गाँवों और निर्धन बस्तियों में भी धर्म की अलख जगानी चाहिए।

5. युवाओं को प्रेरित करनाः युवा वर्ग को सेवा कार्यों में सक्रिय किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ एक संवेदनशील समाज की नींव रखें।

निष्कर्ष

धर्म का उद्देश्य केवल रीति-रिवाजों और आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका मुख्य लक्ष्य समाज के हर व्यक्ति को सन्मार्ग की ओर ले जाना है। विशेषकर उस व्यक्ति को जो स्वयं वहां तक नहीं पहुंच सकता। जैन धर्म का सार ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ में है, न कि वैभव प्रदर्शन में। समय की मांग है कि हम समाज के उस उपेक्षित वर्ग की सुध लें, जो आज स्वयं को जैन कहलाने से भी संकोच करता है। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे जैन समाज का निर्माण करें जो सच्चे अर्थों में समावेशी, करुणामय और धर्मपरायण हो। जहां दिखावे नहीं, सेवा और संवेदना की प्रधानता हो। (यह लेखक के अपने विचार हैं )

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