पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनिश्री जयंत सागर जी महाराज, मुनिश्री सिद्ध सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्रुत सागर महाराज जी का मागितुंगी में 25 मई को मंगल प्रवेश होगा। गुरु आज्ञा का पालन करते हुए पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी जो कि प्रथम बालब्रह्मचारिणी, इन्होंने आर्यिका परंपरा को जीवंत किया। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक पाटील की यह खबर….
नांद्रे। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनिश्री जयंत सागर जी महाराज, मुनिश्री सिद्ध सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्रुत सागर महाराज जी का मागितुंगी में 25 मई को मंगल प्रवेश होगा। मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि ज्ञानमती माताजी देश की नंबर वन सबसे ज्ञानी आर्यिका हैं। प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान जी ने युग की आदि में जीवन जीने की कला सिखाया। गुरु आज्ञा का पालन करते हुए पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी जो कि प्रथम बालब्रह्मचारिणी, इन्होंने आर्यिका परंपरा को जीवंत किया।
108 फीट ऊंची जैन तीर्थंकर की मूर्ति गिनीज बुक में शामिल
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की 108 फीट ऊंची प्रतिमा को ‘गिनीज वर्ल्ड रिकार्डस’ में सबसे विशाल जैन प्रतिमा के रूप में शामिल किया गया है। इस प्रतिमा को एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी जहां उन्होंने संपूर्ण भारत की पदयात्रा कर शताधिक आत्माओं में वैराग्य की ज्योति जगाई है, वहीं हस्तिनापुर में दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के प्रबंधकों को प्रेरणा देकर जम्बूद्वीप की प्रतिकृति के रूप में न केवल जैन समाज अपितु संपूर्ण विश्व को एक अद्वितीय उपहार दिया है। खुले आकाश के नीचे वलयाकार लवण समुद्र से वेष्ठित 101 फीट उत्तुंग सुमेरु के चारों ओर बनी जम्बूद्वीप की भव्य रचना को देखकर तिलोयपण्णत्ति, जम्बूद्वीवपण्णत्तिसंगहों में निहित भूगोल विषयक सामग्री को सहज ही हृदयंगम किया जा सकता है। वर्तमान में ‘जम्बूद्वीप’ के नाम से विख्यात इस परिसर में स्थित कमलमंदिर, ध्यान मंदिर, त्रिमूर्ति मंदिर, सहस्रकूट जिनालय, ॐ मंदिर, भगवान वासुपूज्य मंदिर, तेरहद्वीप जिनालय, जम्बूद्वीप पुस्तकालय, विस्तृत उद्यान समग्र रूप से इसकी शोभा में अभिवृद्धि करते हैं। नांद्रे नगरी का परम सौभाग्य है कि वर्ष 2025 के वर्षायोग के लिए पट्टाचार्य श्री 108 श्री विशुद्धसागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, श्रमण मुनिश्री सिद्ध सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री श्रुत सागर महाराज का विहार इंदौर से हुआ है।













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