समाचार

भगवान श्रेयांसनाथ जी का गर्भ कल्याणक 18 मई को: तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है गर्भ कल्याणक 


जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज में उत्साह का माहौल है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। पुराणों के अनुसार ग्यारहवें तीर्थंकर जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में सिंहपुर नगर के इक्ष्वाकुवंशी राजा विष्णु और रानी नंदा के पुत्र थे। ये ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी श्रवण नक्षत्र में प्रातःकाल रानी नंदा के गर्भ में आए। इस अवसर पर सकल संसार में सुखद अनुभूति हुई। गर्भ में आने के बाद फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन विष्णुयोग में इनका जन्म हुआ। जन्म के समय रोगी निरोग हो गए थे। चारों निकाय के देवों ने आकर इनका जन्माभिषेक किया था। सौधर्मेंद्र ने जन्माभिषेक के बाद आभूषण आदि पहनाकर इनका श्रेयांस नाम रखा था। इनका जन्म शीतलनाथ के मोक्ष जाने के बाद सौ सागर, छियासठ लाख और छब्बीस हजार वर्ष कम एक करोड़ सागर प्रमाण अंतराल बीत जाने पर हुआ था। इनकी आयु चौरासी लाख वर्ष की थी। शरीर सोने की कांति के समान था।

ऊंचाई अस्सी धनुष थी। कुमारावस्था के इक्कीस लाख वर्ष बीत जाने पर इन्हें राज्य मिला था। इन्होंने 42 वर्ष तक राज्य किया। वसंत के परिवर्तन को देखकर इन्हें वैराग्य जागा। लौकांतिक देवों ने आकर इनकी स्तुति की। इन्होंने राज्य श्रेयस्कर पुत्र को दिया तथा विमलप्रभा पालकी में बैठकर ये मनोहर नामक वन में पहुंच गए। वहां इन्होंने दो दिन के आहार का त्याग कर फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन प्रातः बेला और श्रवण नक्षत्र में एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। इसी समय इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। इन्हें सिद्धार्थ नगर में राजा नंद ने आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए थे। छदमस्थ अवस्था के दो वर्ष बाद ही मनोहर उद्यान में तुंबुर वृक्ष के नीचे माघ कृष्ण अमावस्या के दिन श्रवण नक्षत्र में इन्हें केवलज्ञान हुआ। इनके संघ में कुंथु आदि 77 गणधर 13 सौ पूर्वधारी, 48 हजार 200 शिक्षक, 6 हजार अवधिज्ञानी, 6 हजार 500 केवलज्ञानी, 11 हजार विकियाऋद्धिधारी, 6 हजार मनरूपर्ययज्ञानी और 5 हजार वादी मुनि तथा एक लाख बीस हजार धारणा आदि आर्यिकाएं थीं। सम्मेदशिखर पर इन्होंने एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमायोग धारण किया था। श्रावण शुक्ल पौर्णमासी के दिन सायंकाल के समय घनिष्ठा नक्षत्र में शेष कर्मों का क्षय करके येकृ‘अ इ उ ऋ लृ’ इन 5 लघु अक्षरों के उच्चारण में जितना समय लगता है। उतने समय में मुक्त हुए।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page