मुनिश्री सुधासागरजी के शुक्रवार को धर्मसभा में प्रवचन हुए। इसमें उन्होंने धर्म, कर्म और कर्तव्यों की सीख दी। मुनिश्री के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु, मुनि भक्त और समाजजन जुट रहे हैं। बहोरीबंद से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
बहोरीबंद। मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने शुक्रवार को अपने प्रवचन में धर्म और कर्म की शिक्षा देते हुए श्रावकों को जैन और जीवन दर्शन से परिचित कराया। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि जितना लोग दुनिया को बुरा कहते हैं। ये दुनिया उतनी बुरी नहीं है, जितने दुख व्यक्ति संसार में मानता है, उतने दुख संसार में है नहीं। सृष्टि बुरी नहीं है, हमारी दृष्टि बुरी है। अपन संसार पर आरोप लगा देते हैं, संसार बुरा नहीं है, अपनी नियत बुरी है। उसी दुनिया को ज्ञानी व्यक्ति देखता है लेकिन, उसकी नियत खराब नहीं होती। एक ही वस्तु को अनेक लोग देखते हैं, वह सबके लिए नुकसानदायक नहीं होती। जैन दर्शन इतना व्यापक है कि सबको समाहित कर लेता है, बस फर्क है कि इसकी आचार संहिता बहुत कठिन है। विश्व में एक मात्र जैन दर्शन ऐसा है जो हर व्यक्ति को बराबर अधिकार देता है। हर व्यक्ति भगवान बनने की शक्ति रखता है। जैन धर्म कोई जाति नहीं थी, आज जाति बन गई।
सबका एक ही धर्म, एक ही मंदिर था
पहले सभी वर्ण के लोग जैन धर्म मानते थे। वर्ण व्यवस्था थी, ये कर्म के आधीन थी। ये तो आजीविका कमाने का साधन है। धर्म सबका एक था ऋषभदेव के समय। एक भगवान, एक गुरु, एक मंत्र थे। सब एक थे, बस कोई शिल्प का काम करता था तो कोई व्यापार, कोई पंडिताई, कोई क्षत्रियता का। इसलिए सभी जातियां एक दूसरे में संबंध बनाती थी, कोई भी छुआछूत की बीमारी नहीं थी। तुम्हारा मामा शुद्र हो सकता है। तुम्हारा दादा क्षत्रिय हो सकता है, तुम्हारा फूफा वैश्य हो सकता है, तुम्हारी फूफी ब्राह्मण हो सकती है, कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि, ये सब वर्ण व्यवस्थाएं जो थी, मात्र रोजी रोटी कमाने के तरीके थे। इनसे जीवन का कोई संबंध नहीं था, किसी तरीके से कमाओ सबका एक ही धर्म, एक ही मंदिर था।
जैन धर्म था और धर्म सूर्य के समान होता है
ऋषभदेव के समय इंटर कास्ट था ही नहीं, सब एक ही कास्ट के थे। धर्म एक थे, गुरु एक थे, कुछ भेद था ही नहीं। संतान क्रम से वर्णों की व्यवस्थायें नही थी, आजीविका, व्यापार को लेकर वर्ण व्यवस्था थी, आज जो व्यवस्थाएं हैं वो जाति बन गयी है और दुर्भाग्य तो सबसे बड़ा ये है कि जातियों ने भी धर्म को बांट दिया। जैन का जैन धर्म, मुसलमान का मुस्लिम धर्म, इसाई का क्रिश्चियन धर्म। जब जाति संतानकृत, कुलकृत हो गई तो लोगों ने धर्म बांट लिया। ऋषभदेव ने जैन धर्म को व्यापक बताया था कि जैन धर्म जो सच्चा धर्म है वो किसी जाति का या व्यक्ति का नहीं होता, वो प्रत्येक वस्तु का होता है, इसलिए जैन धर्म नाम की कोई जाति थी नहीं, शास्त्रों में उल्लेख नहीं मिला। जैन जाति नहीं, जैन धर्म था और धर्म सूर्य के समान होता है, जैसे सूर्य सबकों एक सामान प्रकाश बांटता है। इसी प्रकार जैनधर्म की आचार संहिता जो बनाई, पहले सबके आचार-विचार एक थे, इसलिए उन्होंने कह दिया, णमो लोए सव्वसाहूणं लेकिन, आज साधुओं के खोटे वेश हो गए। साधु खोटे हो गए और साधु में साधुता खत्म हो गई तो फिर कहना पड़ा कि वे ही सारे साधु वंदनीय हैं जो इस प्रकार की आचार संहिता का पालन करते हैं।
जैन में भी मुनि बनें, आज इज्जत और बढ़ गई
निगोद नीयत से मिलता है और दो इंद्रियपना कर्म से मिलता है। जो इज्जत है, शान है, वो नियतवाद में नहीं है, हमने प्रयास किया हम दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय बनें, इन सबको गौण करते हुए हम मनुष्य बनें, ये प्रकृति की देन नहीं, हमारा प्रोडक्शन है। मनुष्य में भी जैन बनें, ये प्रोडक्शन है तुम्हारा, जैन में भी मुनि बनें, आज इज्जत और बढ़ गई। गुजारो मत महानुभाव, हमारा दिन निकल न जाये, हमारा दिन कुछ खुशहाली देकर निकले।
उससे कहो- चिंता मत करना घर में मैं हूं
परिवार वालों से कहना है। तीन समय कभी कलह मत करना, जब व्यक्ति भोजन कर रहा हो। उस समय कोई कलह वाली बात मत सुनाना लेकिन, पत्नी उसी समय सुनाती है, ये पत्नी नहीं है, पूर्वजन्म की बैरन है। दुश्मन भी जिस समय भोजन के लिए बैठा है, उस समय कोई कलह, दुश्मनी नहीं। भोजन करते समय किसी को ऐसी बात मत सुनाना जिससे वो डर जाए, क्लेश हो जाए। जिंदगी में खाते समय जो नारी या पुरुष कलह करते हैं, जाओ एक दिन तुम्हारी जिंदगी में ऐसा आ जाएगा कि तुम एक दाना भी नही खा पाओगे या ऐसी बीमारी आ जाएगी या ऐसी गरीबी आ जाएगी। कितना भी दुश्मन क्यों न हो, हम भोजन करते समय राग-द्वेष की बातें नहीं करेंगे। दूसरी कलह मत करना जब कोई तुम्हारे घर से बाहर निकल रहा हो, चौखट के बाहर कदम रख रहा हो। उस समय अच्छे से, हंसी खुशी, तिलक लगाकर भेजो। उससे कहो- चिंता मत करना घर में मैं हूं और जाने वालों से कह रहा हूं, घर से बाहर कभी संक्लेश या क्रोध करके मत जाना, हंसते हुए बाहर कदम रखना। तीसरा जिस समय व्यक्ति सोने के लिए तैयार हो रहा है। बस संक्लेश करके मत सोना और परिवार वाले भी किसी को संक्लेशित करके मत सुलाएं। बेटे को रोते हुए, थप्पड़ मारकर मत सुलाना, लोरी गाते हुए सुलाना। कितना दुश्मन क्यों न हो यदि वह सो रहा है तो कलह मत करना।













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