दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -87 ईश्वर उन्हीं को अपनाते हैं जो पूर्ण शरणागति और दीनता से उनकी ओर बढ़ते हैं : ईश्वर की कृपा उसी व्यक्ति में टिकती है जो विनम्र होता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 87वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


ऊंचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय।

नीचा हो सो भरिए पिए, ऊँचा प्यासा जाय॥


यह दोहा अत्यंत गहन और बहुआयामी जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है। जल के स्वाभाविक गुणों के माध्यम से कबीरदास जी हमें यह समझाना चाहते हैं कि जैसे पानी हमेशा निचाई की ओर बहता है और वहीं ठहरता है, वैसे ही ज्ञान, भक्ति, प्रेम और ईश्वर की कृपा भी उसी व्यक्ति में टिकती है जो विनम्र, दीन और अहंकार-रहित होता है।

अहंकार और विनम्रता का प्रतीक:

ऊंचाई यहां अहंकार का प्रतीक है — जो व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ समझता है, उसमें न तो ज्ञान टिकता है, न ही भक्ति की अनुभूति होती है। वह बाहर से ऊंचा दिख सकता है, पर भीतर से वह प्यासा, खाली और अधूरा रह जाता है। इसके विपरीत, जो स्वयं को छोटा समझते हैं, दूसरों को आदर देते हैं और विनम्र बने रहते हैं, वे जीवन के वास्तविक सुख, संतोष और ईश्वर की कृपा को प्राप्त करते हैं।

धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण:

यह दोहा धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत सारगर्भित है — ईश्वर उन्हीं को अपनाते हैं जो पूर्ण शरणागति और दीनता से उनकी ओर बढ़ते हैं। सामाजिक स्तर पर यह सीख देता है कि विनम्रता से ही संबंध बनते हैं, और घमंड से व्यक्ति अलग-थलग पड़ जाता है।

आध्यात्मिक संदेश:

आध्यात्मिक रूप से यह दोहा हमें अंतर्मुखी बनाता है और आत्मा की शुद्धि का मार्ग सुझाता है — जब तक हम स्वयं को “मैं” से खाली नहीं करते, तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हो सकता।

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