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दृष्टि बदल दो, सृष्टि बदल जायेगी-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजीः व्यक्ति को लगे कि इसका सुख मेरे अधीन, वही से शोषण चालू


धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि प्रकृति को एक माँ की संज्ञा दी जाती है, माँ की संज्ञा क्यों? क्योंकि माँ जन्म दे सकती है जीवन नहीं, प्रकृति भी हमें जन्म दे सकती है, जीवन नहीं। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू की यह पूरी खबर…


बहोरीबंद (कटनी)। जब चल रहा था तब अकेला था, जब सांसे टूट गई तब सब साथ चलने लगे। जब नहीं चल पाता था तो उंगली पकड़कर चलाते थे, जब चलने लगा तो लोग गिरने लगे, ये दुनिया है ही ऐसी। प्रकृति को एक माँ की संज्ञा दी जाती है, माँ की संज्ञा क्यों? क्योंकि माँ जन्म दे सकती है जीवन नहीं, प्रकृति भी हमें जन्म दे सकती है, जीवन नहीं। जन्म का अर्थ है रॉ मेटीरियल, तुम्हे योग्य बना दिया। प्रकृति के भरोसे यदि तुमने पूरी जिंदगी गुजारी दी तो तुम जन्म तो ले लोगें। लेकिन जीवन का मजा नहीं ले पाओगे क्योंकि प्रकृति जीवन नहीं दे सकती। जितनी ये महान आत्मायें है, ये निमित्त है ये प्रकृति के अंदर आते है। गुरु हमें व्रत दे सकते है, गुणस्थान नहीं। निमित्त हमारे लिए सावधान करता है लेकिन चला नहीं सकता।

सब कुछ होकर भी हमारे पास अधिकार नहीं 

किस्मत हमें सर्वस्व दे सकती है लेकिन सार्वभौम हमें प्राप्त करना है। हमारे पास सब कुछ होकर भी हमारे पास अधिकार नहीं। अधिकार मिलते नहीं है, अधिकतर पाए जाते हैं, अधिकार योग्यता से आते है और सर्वस्व तुम्हारी किस्मत से, प्रकृति से, भगवान से भी आ सकता है। सरकार तुम्हे नोट दे सकती है लेकिन उस नोट का क्या उपयोग करना है ये उसके अधिकार से बाहर है। समझदार व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं हो तो भी कहता है कि मेरे पास सब कुछ है और मूर्ख व्यक्ति के पास सब कुछ हो तो भी कहता है मेरे पास तो कुछ है ही नहीं। जो व्यक्ति कहता है कि मेरे पास कुछ है ही नहीं, समझना तुम्हारे दरिद्रता के लक्षण आने वाले हैं।

केवलज्ञानी को देख श्रुत केवली को भी लगा मैं तो अज्ञानी हूँ

तुम खुश हो ये सर्वस्व है और तुमसे दुनिया खुश है ये सार्वभौम है। हमारे पास ज्ञान बहुत अच्छा है, मेरी दृष्टि, मेरे कान बहुत अच्छे है, मैं खुश हूँ, ऐसा व्यक्ति भी निंदनीय है, दुर्गति जा सकता है। नीति कहती है ये एक पहलू है, जैन धर्म को पाकर मैं खुश हूँ, शांतिनाथ को पाकर मैं खुश हूँ, जिनवाणी को पाकर मैं खुश हूँ। ये अहंकार नहीं, गर्व है लेकिन इसके बाद भी मैं तुम्हे धर्मात्मा नहीं, फैल का सर्टिफिकेट दे रहा हूँ, ये सारी खुशियां हमें खजूर के पेड़ के समान ऊंचाई देती है क्योंकि ये सब हम अनंतों बार प्राप्त कर चुके है। मैं ज्ञानी हूँ, ऐसा भाव आना भी परिषह है, इसको जीतना है कि मैं ज्ञानी नहीं हूँ। जिनवाणी कहती है कि तू अज्ञानी है मूर्खों के बीच स्वयं को ज्ञानी मान रहा है, थोड़ा ऊपर देख। केवलज्ञानी को देखते ही श्रुत केवली को भी लगता है कि मैं तो अज्ञानी हूँ।

व्यक्ति को लगे कि इसका सुख मेरे अधीन, वही से शोषण प्रारंभ

तुम दुनिया के पीछे भागोगे तो दुनिया तुम्हे छोड़कर भागेगी, तुम दुनिया को छोड़ दो, दुनिया तुम्हारे पीछे भागेगी। पराधीन जब भी हो जाओगे तुम बुद्धू बनते जाओगे, संसार की अपेक्षा कह रहा हूँ। ये संसार का नियम है कि जिस व्यक्ति को पता चल जाये कि इस व्यक्ति का सुख मेरे अधीन है, बस वही से तुम्हारा शोषण चालू हो जाएगा, अब तुम्हारी ब्लैकमेलिंग चालू। बंधुओ गुलाम व्यक्ति का कोई सगा नहीं होता, सगी माँ तक ने तुम्हे बुद्धू कह दिया, इसलिए जिनवाणी माँ ने कहा कि तुम इतना साहस दिखा दो कि मैं माँ के बिना भी जी सकूँगा, फिर माँ तुम्हें बुद्धू नहीं, नमोस्तु कहेगी क्योंकि माँ जान गई कि बेटा मेरा बिना भी सुखी रह सकता है। हम साधुओं को कहा कि जिन जिन चीजों के बिना गृहस्थ दुःखी रहता है, उन उन चीजों के बिना तुम खुश रहकर दिखाओ तो जैन साधुओ कहलाओ।

दृष्टि बदल दो, सृष्टि बदल जायेगी 

जूता चमत्कारी होता है पर शर्त है वो बाप का होना चाहिए, सिर बेटे का होना चाहिए और लगने पर ये भाव आना चाहिए कि पिताजी ने जूता नहीं मारा है, आशीर्वाद दिया है, जाओ चमत्कार हो गया। पिताजी ने भले गुस्से में मारा है लेकिन तुमने उसे आशीर्वाद माना है तो वह जूता भी तुम्हे आशीर्वाद का काम करेगा। साँप रखा होगा तो रखा होगा घड़े में लेकिन मैंने मान लिया कि हार है तो हार है। दृष्टि बदल दो, सृष्टि बदल जायेगी। हमारा नजरिया बदल जाएगा तो सारी दुनिया वैसी ही होगी, जैसी हमारा नजरिया होगा। उसी वस्तु को हम अच्छी दृष्टि से देखेंगे तो वो अच्छी होवे या न होवे, हमारा जरूर अच्छा होगा।

माँ-बाप के पास वो कला है जो खुशी में भी दुख देखती है

गुरु कौन है? शिष्य हंस रहा है और खुशियाँ मना रहा है और गुरु को उसमें दुख दिख रहा है। तुम्हें गुटखा खाने में आनंद आ रहा है और तुम्हारा गुरु उस खुशी में आँसू देख रहा है, उस आनंद में कैंसर देख रहा है, तेरी पत्नी के विधवा होने का, बच्चों के अनाथ होने का दुख देख रहा है। जब स्वयं की अकल काम न करें तो गुरु की, माँ बाप की अकल से चलो क्योंकि माँ बाप के पास वो कला है जो तुम्हारी खुशी में भी दुख देख लेती है।

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