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देखकर अनदेखी कर दो जहां हम कुछ कर नहीं सकते: मुनिश्री सुधासागर जी ने अपने संदेशों में समाज को जगाया


मुनिश्री सुधासागर जी प्रतिदिन अपने प्रवचनों में धर्म, कर्तव्य और ज्ञान की बातों से दिगंबर जैन समाज के भक्तों और श्रद्धालुओं को दिव्य संदेश प्रदान कर रहे हैं। रविवार को भी उन्होंने धर्मसभा के दौरान देशना में विश्वास, समझदारी और श्रद्धा के महत्व को समझाया। पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर…


कटनी। व्यक्ति जब किसी भी कार्य करने के अभिमुख होता है तो उसके मन में एक संदेह उत्पन्न होता है कि मैं यह कार्य करुं या न करुं ये कार्य सफल होगा या नहीं, यह प्रश्न जब आत्मा में उत्पन्न हो जाता है वहीं से व्यक्ति अपनी शक्तियां खो देता है, इसलिए जैन दर्शन ने कहा मोक्ष मार्ग में पहले तुम निःशंकित हो जाओ। यदि तुम्हारे मन में शंका बनी रहेगी तो न तो तुम इधर के रहोगे और न उधर के। तुम अपना जीवन यूं ही गुजारते रहोगे, कुछ हासिल नहीं होगा।

वहां बोलें जहां बोलने के बाद पाप और घटे

घर मंे मां बहु को समझाने के लिए बेटी को डांटती है। समझदार बहु समझ जाती है कि ये मुझे समझाया जा रहा है। यदि वही बहु सास से झगड़ने लगे तो समझना वह सबसे ज्यादा मूर्ख है। फिर नीतिकारों ने कहा ऐसे व्यक्तियों को सीधे-सीधे समझाओ या फिर इन्हें बिगड़ने दो, मर रहे हैं तो मरने दो, अपन को कोई लेना देना नहीं। मध्यस्थ हो जाओ। देखकर अनदेखी कर दो, क्योंकि हम कुछ कर ही नहीं सकते, हम असमर्थ हैं, हम समझाएंगे तो यह कषाय और करेगा। तो क्या चुप रह जाने पर पाप का समर्थन नहीं होगा, नहीं होगा क्योंकि, बोलने के बाद वह पाप और बढ़ेगा, वहां बोलना चाहिए, जहां बोलने के बाद पाप और घटे, जैसे जानवरों की हिंसा, तुम रोक नहीं पाओगे, मना करने पर कषाय बढ़ेगी।

नारकियों का वर्णन सुनकर सुधर जाओ

गुरु के मुख से निकल जाए कि तुम पापी हो तो मान लो कि मैं पापी हूं, क्योंकि गुरु के मुख से कभी झूठ निकल ही नहीं सकता। यदि हो सके तो महानुभाव गुरु से कहिए कि आप तो सीधा-सीधा कहिए, आदेश दीजिए, परम भक्त हूं। यदि पापी हैं तो पापी कहिए, मैं बुरा नहीं मानूंगा। अब यदि दूसरा व्यक्ति है उससे तुम सीधी कहोगे तो बुरा मान जाएगा लेकिन, इसको इशारे से समझाओ तो यह समझ जाएगा। इसके लिए जिनवाणी ने उपदेश दिया, नारकियों की वेदना हमें बताई। इसलिए नारकियों का वर्णन सुनकर तुम सुधर जाओ। जब-जब तुम्हारे गुरु महाराज तुम्हें कहानी सुनाएं कि इसने ऐसा किया तो ये बना, इसने रात्रि भोजन किया तो शूकर, मार्जर बना तो अब तुम समझदार होंगे तो समझ जाओगे कि ये कोई शूकर की कहानी नहीं, हमें शूकर बनने से बचाने का तरीका होता है।

मैं भाग्यवान हूं कि गुरु के चरण मेरे पास आए हैं

क्यों नहीं हो रहा है मंगल, क्यों आ जाते हैं विघ्न क्योंकि, अपनी धारणा है कि गुरु के हाथ का आशीर्वाद मांगलिक है और लात बुरी। मां-बाप ने लात मार दी, अरे मूर्ख, जो चमत्कार गुरु के हाथों में नहीं, वो चमत्कार गुरु के पैरों में होता है। दुनिया चरणों के पास आती है और मैं भाग्यवान हूं कि गुरु के चरण मेरे पास आए हैं। भगवान, गुरु मंगल हैं, इनके दर्शन के बाद भी मंगल नहीं हो रहा है। णमोकार मंत्र पढ़ने के बाद भी मंगल नहीं हो रहा है क्यों? उस दिन तुम्हारा मंगल होगा, पहले ये बताओ तुम्हारी श्रद्धा, विश्वास कैसा है? सामने वाला सांप लाया है लेकिन मनोवती के मन में एक ही भाव है-‘मेरा ये अहित नहीं कर सकता।’ संदेह भी नहीं था और विश्वास का चमत्कार हुआ कि कलश में हाथ डाला और नाग का हार बन गया।

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