मंथन पत्रिका

दोहों का रहस्य - 9 चिंता से प्रभावित होती है मानसिकता : ईश्वर में आस्था है चिंता से मुक्ति का मार्ग


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की नवीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए।

वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।


“चिंता ऐसी डाकिनी” यह शब्द जीवन को नई दृष्टि से देखने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। यह एक ऐसा संदेश है जो आत्मा को शांति, मन की स्थिरता और जीवन को अर्थ देता है। यह दोहा एक दीपक की तरह है, जो हमारे जीवन के अंधकार को दूर करता है। यह हमें सिखाता है कि चिंता को त्याग कर, ईश्वर पर विश्वास रखते हुए और अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करके हम अपने जीवन को सुंदर और सार्थक बना सकते हैं। जीवन सरल है, लेकिन हम अपनी चिंता से इसे जटिल बना देते हैं।

आज का व्यक्ति अनिश्चितताओं और भविष्य की चिंता में फंसा हुआ है। चिंता का मूल कारण स्वयं का बोध न होना माना जाता है। हमें निस्वार्थ जीवन जीते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और फल की चिंता से मुक्त रहना चाहिए। चिंता एक ऐसी आग है जो अंदर से जलती है और बाहर का सब कुछ समाप्त कर देती है। चिंता से बचने का एकमात्र उपाय आत्मशांति और ईश्वर में आस्था है। ईश्वर के प्रेम से जुड़कर हम चिंता मुक्त रह सकते हैं।

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