उत्तम तप धर्म वह है जो हमें आत्मा की गहराई को समझने और जीवन के उच्चतम उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। यह न केवल शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों को सहन करने की क्षमता को दर्शाता है, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में बढ़ने के प्रयास को भी इंगित करता है। पढ़िए मुनि श्री पूज्य सागर महाराज का विशेष आलेख…
दसलक्षण धर्म का सातवां कदम यानी ‘उत्तम तप धर्म’। तप को अध्यात्म का मूल माना गया है। तप शरीर को कष्ट देकर किया जाता है। जैसे सोने को तपाकर आभूषण बनाए जाते हैं उसी तरह शरीर को तपाकर ही आत्मा को परमात्मा बनाया जा सकता है। सोना तब तक ही स्वर्ण रहता है जब तक वह तिजोरी में बंद था। जब वह तपकर गहना बन गया और शोरूमों की शान बढ़ाने लगा तो लोगों की आंखों का नूर हो गया, प्रशंसा का पात्र बन गया। उसी तरह भले ही तप करने से शरीर को कष्ट होता हो, परेशानी होती हो लेकिन उसके बाद तो आत्मा पूज्यता को प्राप्त हो जाती है।
कोयले को सफेद बनाने की शक्ति संसार में किसी के पास है तो वह है अग्नि में। जब वह कोयला अग्नि की संगति कर लेता है वह कोयला राख बनकर सफेद हो जाता है। व्यक्ति संतुलित भोजन, ध्यान, बड़ों का सम्मान, पापों को स्वीकारोक्ति और गुरु सेवा के माध्यम से जीवन में तप को बढ़ा सकता है। तप शक्ति परीक्षण स्थल है, जो इसमें पास हो गया, वह मोक्ष को प्राप्त करने का हकदार हो जाता है।













Add Comment