अतिशय क्षेत्र देहरा तिजारा की धरा पर वर्षायोगरत आचार्य श्री वसुनन्दी महाराज की सुशिष्या आर्यिका वर्धस्व नंदिनी माताजी ने दस लक्षण पर्व के तीसरे दिवस वृहद समवशरण महाअर्चना के दौरान उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन करते हुए कहा कि मार्दव धर्म के पश्चात ही व्यक्ति के चित्त में आर्जव धर्म का बीजारोपण होता है। क्योंकि जब तक हृदय में ऋजुता नहीं होगी तब तक कोई बीज अंकुरित नहीं होगा और अकड़न तो वैसे भी मुर्दा की पहचान है। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…
तिजारा/अलवर। अतिशय क्षेत्र देहरा तिजारा की धरा पर वर्षायोगरत आचार्य श्री वसुनन्दी महाराज की सुशिष्या आर्यिका वर्धस्व नंदिनी माताजी ने दस लक्षण पर्व के तीसरे दिवस वृहद समवशरण महाअर्चना के दौरान उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन करते हुए कहा कि मार्दव धर्म के पश्चात ही व्यक्ति के चित्त में आर्जव धर्म का बीजारोपण होता है। क्योंकि जब तक हृदय में ऋजुता नहीं होगी तब तक कोई बीज अंकुरित नहीं होगा और अकड़न तो वैसे भी मुर्दा की पहचान है। आर्यिका श्री ने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म वह है जो व्यक्ति को बनावटी दुनिया से बाहर निकालता है।आज प्रत्येक व्यक्ति मोबाइल से लेस है, क्योंकि आज मोबाइल की दुनिया है।
आप ही बताओ क्या जैसे आप इंस्टाग्राम फेसबुक व्हाट्सएप पर दिखते हो असल में जिंदगी में भी वैसे ही हो क्या? “नहीं आप” जैसे हो वैसे दिखते नहीं,जैसे आप हो वैसे दिखते नहीं। आर्जव धर्म तो कहता है जो है वह रहें, जो नहीं है वैसे बनने का प्रयास करना तो छल व मायाचारी है। व्यक्ति के शरीर का सबसे खूबसूरत हिस्सा उसका दिल (हृदय) है मगर वही साफ ना हो तो मात्र चमकता चेहरा किसी काम का नहीं। इसलिए आप अपने कठोर मनोभावों को बदले, वस्त्राभूषण नहीं।
क्योंकि आईना बदलने से शक्ल नहीं बदलती, सरलता,सहजता कोमलता,संवेदनशीलता व स्पष्टवादी होना आर्जव धर्म की निशानी है। आर्यिका श्री ने श्रावकों से प्रश्न करते हुए कहा कि आप एक बार जरूर विचार कीजिए क्या जो आप सोच रहे हैं क्या वही बोल रहे हैं? जो बोल रहे हैं क्या वही कर रहे हैं? यदि यदि नहीं तो अपनी प्रवृत्ति बदले। निश्चल प्रवृत्ति धारण करें यही आर्जव धर्म सिखाता है।













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