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धर्मसभा में दिए प्रवचन : सहायता उनकी करो जिसका कोई सहारा नहीं : मुनि श्री सुधासागर जी महाराज


हम अपने आप को सबसे छोटा, सबसे बड़ा मूर्ख समझें, अज्ञानी होकर नही, ज्ञानी होकर। दूसरा व्यक्ति हमें मूर्ख कहे उसके पहले कहना मैं तो मूर्ख हूं ही, कौन सा बुरा बोल रहा है। चाहने की यह परिभाषा नहीं है कि कौन हमारी जिंदगी में कितना काम आएगा, 90% लोग दुनिया को इसलिए चाहते हैं कि यह वस्तु यह व्यक्ति जिंदगी में काम आएगा। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में प्रवचन के दौरान कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


सागर। हम अपने आप को सबसे छोटा, सबसे बड़ा मूर्ख समझें, अज्ञानी होकर नही, ज्ञानी होकर। दूसरा व्यक्ति हमें मूर्ख कहे उसके पहले कहना मैं तो मूर्ख हूं ही, कौन सा बुरा बोल रहा है। चाहने की यह परिभाषा नहीं है कि कौन हमारी जिंदगी में कितना काम आएगा, 90% लोग दुनिया को इसलिए चाहते हैं कि यह वस्तु यह व्यक्ति जिंदगी में काम आएगा। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में प्रवचन के दौरान कही।

उन्होंने कहा कि मरते समय व्यक्ति यह नहीं सोचता कि वह कहां गया, उसे रोना इसलिए आता है कि अब मेरा क्या होगा, मैं तो इसी के भरोसे पर था। जैसे तुम एफडी बना लेते कि किसी काम मे आएगी, ऐसे ही तुम सम्बन्ध बनाते हो कि ये मेरे किसी काम आएगा। धर्म कहता है जिसका कोई नहीं है उसके तुम हो जाओ, वो तुम्हारा जन्म जन्म तक एहसान मानेगा। जिसका साथ दुनिया दे रही है, किस्मत, परिवार, गुरुजन, समाज भी साथ दे रही है, उसका साथ तुम दे रहे हो तो कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन जिसका कोई भी साथ नहीं दे रहा है, धर्म में जाने लायक नहीं है वो, ऐसी किस्मत खराब है कि गुरु का दर्शन नहीं कर सकता, बदकिस्मती है, देख नही सकता, अंधा है।

बोल नहीं सकता गूंगा है। चल नहीं सकता लंगड़ा है। उसमे भी भिखारी है, अनाथ है। नीति कहती है कि ऐसे व्यक्ति का तुम साथ दे दो, जाओ तुम्हारा एक दोस्त जन्म जन्म का तुम्हारा हो गया। विपत्ति काल में कोई साथ दे दे तो वही सच्चा साथी है।

संकट के साथी को मत छोड़ना

कौन है हमारा साथी? उस साथी का साथ कभी नहीं छोड़ना, मरना पड़े तो मर जाना, लूटना पड़े तो लूट जाना पीटना पड़े तो पिट जाना, कुछ भी कर लेना लेकिन जिसने संकट में साथ दिया हो, इसको कभी मत छोड़ना। वह स्थान सबसे अच्छा माना जाता है जिसे व्यक्ति मरने के लिए चुनता है, दुनिया तो मंदिर अमर होने के लिए जाती है लेकिन पूज्यपाद स्वामी कहते हैं कि मरुं तो प्रभु तेरे मंदिर में मरुं। दुनिया तो णमोकार मंत्र इसलिए पढ़ती है कि णमोकार मंत्र पढ़ेंगे तो मरने से बच जायेगे, पूज्यपाद स्वामी कहते हैं मरुं तो णमोकार मंत्र फेरते समय मरुं। नीलांजना की मौत आदिनाथ के लिए शगुन बन गयी। दुनिया गुरु के सामने इसलिए आती है कि मैं मर रहा हूं, मुझे बचाओ लेकिन पूज्यपाद स्वामी कहते हैं कि यदि मेरा मरण हो तो गुरु महाराज के चरणों की वंदना करते समय हो।

जहां यतियों का समूह हो वहां मेरा मरण हो। मरण करते समय चैत्यालय नही, चैत्यालय की वंदना कर रहा हूं उस समय मेरा मरण हो। मुनि महाराज के मुख से प्रवचन हो रहा हो उस समय मेरा मरण हो। मरुं तो सम्मेदशिखरे में मरुं, दिवाली के दिन मरुं। दिवाली के दिन कोई मर जाए तो डबल दिवाली मनाओ, एक महावीर स्वामी की और एक महावीर स्वामी के दिन।

जैन दर्शन में मृत्यु का महोत्सव

संसार के किसी भी दर्शन ने मौत को महोत्सव नहीं कहा, उन्होंने मौत की संज्ञा यमराज को दी जाती है। मात्र एक जैनदर्शन ऐसा है जो मृत्यु को महोत्सव और शुभ मानता है। कुछ स्थानों पर मौत को नहीं, समाधि को महत्व दिया पर वहाँ जो मरने का प्रोसेस है वह विनोबा भावे को पसंद नहीं था, जल समाधि- कमर में पत्थर बांधकर पानी में डूब जाओ, अग्नि समाधि- अग्नि चिता में जलती हुई प्रवेश कर जाओ, भूमिगत समाधि- गड्ढे में गिर जाओ ऊपर से गड्ढा पैक कर दो, ये हठयोग है, इसलिए हमारे यहां कहा कि लाखों वर्षों तक जीना पड़े तो मुझे कोई डर नही है लेकिन मृत्यु आवे तो आ जावे। जो विधि जैन दर्शन में है घुट घुट कर मत मरो, प्राणों का घात मत करो। जैनदर्शन मरो और मरने दो का नाम नहीं, जियो और जीने दो का नाम है। तो कब मरना- जब मरना निश्चित हो चुका है, जब मरण को अब कोई टालने वाला नहीं है।

यदि जीने के लिए संयम में दोष लगता है तो पूज्य अमृतचन्द्र स्वामी महाराज अपहृतसंयम का उपदेश देते है, अति कर्कश आचरण मत करो जिससे तुम्हारी मौत हो जाये। संयम में दोष भी लगता है और जिंदा रह सकते हो तो दोष लगा दो तो बाद में प्रायिश्चित्य किसके लिए था। प्रायिश्चितय इसलिए था कि कवचित कदाचित बुद्धिपूर्वक भी दोष लगाना पड़े तो जिंदा रहने के लिए लगाया हैं, बाद में प्रयाश्चित दे दिया जाएगा। हानि लाभ देखा जाएगा।

मन में सोचे तो ही फल मिलेगा

विनोबा भावे ने पकड़ा कि जैनियों के यहां जो संल्लेखना है वहां मारा नहीं जाता, मरने वाले को हंसते-हंसते भेजा जाता है। विनोबा भावे हमेशा भावना भाते थे कि मेरा मरण हो तो महावीर भगवान की विधि के अनुसार हो। मरने के पहले 12-15 दिन पहले से उन्होंने विधिपूर्वक अन्न-जल छोड़ना शुरू किया। अंत मे जब तीन दिन बचे उन्होंने अन्न-जल छोड़ दिया। इंदिरा गांधी ने कहा आप राष्ट्रसंत है, आपकी देश को बहुत जरूरत है, आप दवाई ले लीजिए, अन्न जल ग्रहण कीजिये। उन्होंने कहा मेरे जीवन का अंत निकट आ चुका है, अब दवाई ले या भोजन करे तो भी मैं बचने वाला नही हूं। जब इंदिरा गांधी ने दबाब डाला तो विनोवा भावे ने कहा कि मेरे और परमात्मा के बीच मे दबाब और दवाई की जरूरत नही है। धवला जी मे लिखा है कि घर से यदि व्यक्ति ने संकल्प कर लिया कि मैं मंदिर जाऊंगा, अब वो पहुंचे या न पहुंचे , उसे मंदिर का पुण्य उसी समय लागू हो गया, जिस समय उसने संकल्प किया। यदि संसार में पापी नहीं होते तो धर्मात्मा को धर्म करने का मौका नहीं मिलता क्योंकि पापियों की आड़ में भी धर्म पलता है यदि हम पॉजिटिव सोच लेते हैं। जिनका कोई बचाता नहीं उनका बचाओ तो तुम बच जाओगे। सहायता उनकी करो जिसका कोई सहारा नहीं। जो विपत्ति में काम आता है, वहीं अंत में साथ आता है। जब किसी ने साथ नहीं तब जिसने साथ दिया हो, बस उसका साथ कभी छोड़ना नही।

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