जन्मनाम अरविंद यानी कमल, जन्म से ही संसार रूपी समुद्र में कमल सम जीवन जीने वाले व्यक्तित्व ने अपनी 41 वर्षीय दिगम्बरत्व की अनुपम यात्रा का शिखर आरोहण अभूतपूर्व, अनुपम अविस्मरणीय समाधि से कर दिगम्बर जैन जगत के सामने अपनी सरलता, सहजता, संस्कार, समर्पण, शुचिता के साथ सम्यक्त्व का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो युगों-युगों तक जयवंत होकर दिगम्बरत्व की ध्वज पताका को कायम रखेगा। पढ़िए राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ का विशेष लेख
जन्मनाम अरविंद यानी कमल, जन्म से ही संसार रूपी समुद्र में कमल सम जीवन जीने वाले व्यक्तित्व ने अपनी 41 वर्षीय दिगम्बरत्व की अनुपम यात्रा का शिखर आरोहण अभूतपूर्व, अनुपम अविस्मरणीय समाधि से कर दिगम्बर जैन जगत के सामने अपनी सरलता, सहजता, संस्कार, समर्पण, शुचिता के साथ सम्यक्त्व का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो युगों-युगों तक जयवंत होकर दिगम्बरत्व की ध्वज पताका को कायम रखेगा।
कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों
ऐसा ही सांसारिक लोगों के बीच चमत्कार दिखाया है गणाचार्य विरागसागरजी महाराज ने उन्होंने जो समाधि पूर्व अपना वीडियो रिकार्ड कराया वह उनके अध्ययन की स्पष्टता आगम के प्रति उनके बहुमान को प्रदर्शित करता है। वैसे तो जैन जगत में दीक्षा ली ही इसलिए जाती है कि समाधि संल्लेखना को धारण कर आत्म पथिक बने। 350 दीक्षाओं के प्रदाता होने का सौभाग्य हासिल करने वाले गणाचार्य विरागसागरजी महाराज ने अपने आपको उस दौर में स्थापित किया जिस दौर में उनका विरोध भी हुआ। अपने विरोधियों को बौना साबित करते हुए गणाचार्य श्री विरागसागरजी ने अपने संघ को ऐसा मजबूत बनाया जहां से दिगम्बरत्व का सच्चा दिग्दर्शन करने में उनके शिष्य प्रशिष्यों ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।
दिन-रात आत्मा का चिंतन मृदु संभाषण में वहीं कथन
निर्वस्त्र दिगम्बर काया में भी, प्रकट हो रहा अन्तर्मन
…. पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए वे एक ऐसे आचार्य बने जिन्होंने देश के ललाट पर एक ऐसी चमक बिखेरी जिससे जैन धर्म में उत्तर-दक्षिण की दुरियां मिटी साथ ही पंथवाद की बेड़ियों में जकड़ा समाज भी अपने आपमें महसूस करने लगा कि दिगम्बरत्व एक ऐसा देश है जिसे पालन करने वाला जीवन जीने की कला के साथ मृत्यु को प्राप्त करने की कला भी सीखता है ।
संल्लेखना की पवित्रता के पोषक बने गणाचार्य विरागसागरजी
जब व्यक्ति जन्म लेता है उसी दिन से मृत्यु की यात्रा प्रारंभ हो जाती है । जीवन और मृत्यु के दो पृष्ठ के बीच जीवन की पुस्तक में मनुष्य का वह सब कुछ अंकित होता है जो उसे अजर-अमर बनाता है। गणाचार्य विरागसागरजी महाराज ने अपना संयमी जीवन महत 16 वर्ष की आयु में प्रारंभ कर दिया था। जिस आयु में हम अपना जीवन खेलकूद में व्यतीत करते है । उस आयु में आपने अपने हाथों से पिच्छी धारण कर तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मतिसागरजी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ले ली थी । लौकिक शिक्षा पाँचवी तक अलौकिक पंच महाव्रत में अंतिम समय तक दृढ़ रहे गणाचार्य
यदि हम लौकिक शिक्षा की बात करें तो वे केवल पांचवी तक ही पढ़े, शांति निकेतन कटनी में आपने मध्यमा (इन्टर) तक शिक्षा लेकर अपने आपको अलौकिक बनाने का उपक्रम कर लिया । वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज के विश्वास पर खरे उतरे क्षुल्लक पूर्ण सागर को पूर्ण दिगम्बर बनाने वाले आचार्यश्री विमलसागरजी महाराज ने अपने वात्सल्य से पांचवी पास एक युवा को जीवन की कठिनतम शिक्षा की दीक्षा प्रदान करते हुए पूर्ण दिगम्बरत्व प्रदान किया । महाराष्ट्र का औरंगाबाद धन्य हुआ और नामकरण हो गया मुनिश्री विरागसागरजी महाराज ।
गुरुमुख से निकले ‘विराग’ नाम को सार्थक करने निकले मुनि विरागसागरजी महाराज ने अपने तप त्याग – अध्ययन-मनन- चिंतन-स्वाध्याय के साथ अपनी चर्या का साम्य स्थापित करते हुए अनेक आयाम स्थापित किये । अपने आपको स्थापित करते हुए आपने अपने आपको इतना सक्षम बनाया कि 8 नवम्बर 1992 को सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि में गुरु आज्ञा से आपको जैन दर्शन के 36 मूलगुण धारी आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया । आचार्य पद प्रतिष्ठापन अवसर पर अपनी निस्पृहता प्रदर्शित करते हुए आपने कहा ‘गुरु बना नहीं जाता, बना दिया जाता है और शिष्य बनाये नहीं जाते, बन जाते है ।’
गुरु के विश्वास पर खरे उतरे शिष्यों की लग गई कतारें
आचार्य श्री विरागसागरजी महाराज ने पद पर प्रतिष्ठित होने के बाद एवं समर्थ व सक्षम आचार्य के रूप में अपने आपको स्थापित किया उनके वाक्य शिष्य बनाये नहीं जाते बन जाते है का ऐसा असर हुआ कि शिष्यों की कतारे लग गई । आपने आचार्य, उपाध्याय, मुनि, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक के रूप में 350 दीक्षाएं प्रदान की । आपने अपने शिष्यों में से आचार्य बनाये और उन्हें स्वतंत्रता देकर दिगम्बर धर्म को प्रभावी बनाने का आदेश दिया। देखते-देखते उनके शिष्यों ने सैकड़ों प्रशिष्य तैयार कर दिए जो आज संपूर्ण देश में अपना डंका बजा रहे है । उन्हीं में से एक श्रमणाचार्य 108 विशुद्धसागरजी महाराज को अपनी समाधि के कुछ घण्टे पहले अपना उत्तराधिकारी घोषित करने वाले आचार्यश्री विरागसागरजी महाराज ने जो अपना चेतनामयी विडियो बनवाया व उसमें जिस निस्पृहता से अपना निर्भीक, निराकुल कथन किया वह युगों-युगों तक गणाचार्य विरागसागरजी महाराज को अमरत्व प्रदान कर गया ।
2 जुलाई 2024 को गंभीर हार्टअटैक, समाज एवं चिकित्सकों को दृढता पूर्वक इलाज से इन्कार, पंच महाव्रतों के प्रति अभूतपूर्व दृढ़ता और 3 जुलाई 2024 को स्व संवेदन के साथ आहार चर्या करना फिर स्व-प्रेरणा से अपना विवेकपूर्ण वीडियो संदेश देना, उसमें भी सबसे क्षमा सबको क्षमा और यह कहना कि आज बोल रहे है कल न बोल पाए, आज ध्यान है कल ध्यान न रहे । मैंने पूरा विडियो कई बार सुना उनका हर शब्द न केवल स्पष्ट है बल्कि संसार के प्रति वैराग्य भाव के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। किसी साधक की साधना का नवनीत समाधि के प्रति ललक को प्रदर्शित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जैन दर्शन में सारे पद भार रूप है जिन्हें छोड़ना होता है पद मोक्षमार्ग में बाधक है। इस भावना के साथ उन्होंने अपने पद को छोड़ा और 4 जुलाई 2024 की प्रातःकालीन ब्रह्मबेला के पूर्व 2.27 बजे इस नश्वर देह का त्याग पूर्ण विवेक व प्रतिक्रमण सामायिक के उपरांत किया जो उन्हें एक ऐसा तपस्वी निरूपित करता है जो जैन दर्शन में समाधि की नजीर के रूप में स्थापित करेगा ।
वर्तमान काल में युग प्रतिक्रमण के जनक थे गणाचार्य
हम सबने प्रतिक्रमण खूब सुना लेकिन युग प्रतिक्रमण की चर्चा गणाचार्य विरागसागरजी के मुख से सुनी व देखी । अपने संघ के प्रत्येक साधु के इस निमित्त बुलाकर जैनत्व में प्रभावना का संदेश देकर उन्होंने युग प्रतिक्रमण को जीवंत किया ।
विद्वानों के प्रति अपूर्व स्नेह रखने वाले गणाचार्यजी ने अनेक सम्मेलन कराये, प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया, साहित्य सृजन किया, जीवंत कृतिया तैयार की। उनकी सरलता की सुगंध इतनी फैली थी कि उनसे दीक्षा लेने की लंबी कतार थी । उनकी पारखी नजर ने हमें ऐसे अनेक हीरे दिये जो दिगम्बरत्व के क्षितिज पर अपनी उत्कृष्टता को प्रदर्शित कर रहे है। आचार्य विशुद्धसागरजी, आचार्य विमर्शसागरजी, आचार्य विनम्रसागरजी, आचार्य विनिश्चयसागरजी, आचार्य विभवसागरजी सहित अनेक शिष्य-प्रशिष्य साहित्य सरोवर के राजहंस बनकर जिनागम की सेवा कर रहे है ।
‘वि’ से प्रारंभ शिष्य परम्परा जैन दर्शन की विराग परम्परा
आचार्य विमलसागरजी महाराज से विरागसागर नाम पाकर अपने शिष्यों के नाम में उन्होंने ‘वि’ अवश्य जोड़ा जो उनकी एक विशिष्ट पहचान बनी संपूर्ण देश में ‘वि’ से प्रारंभ होने वाले अधिकांश नामों को यह माना जा सकता है कि वे गणाचार्य विरागसागरजी महाराज के शिष्य है। मुझे उनका चरण सान्निध्य जुलाई 2013 पावागिरि ऊन से सिद्धवरकूट – इन्दौर यात्रा के दौरान मिला । सिद्धवरकूट कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष स्व.श्री प्रदीपकुमारसिंहजी कासलीवाल इन्दौर ने मुझे ( राजेन्द्र जैन महावीर ) व श्री आशीष चौधरी, मुकेश न पेप्सी सनावद को यात्रा की जिम्मेदारी सौंपी, उस दौरान लगभग 1 माह तक हम आचार्यश्री के चरण सान्निध्य में रहे । 09 जुलाई 2013 को आचार्य वर्धमानसागरजी महाराज की जन्मभूमि सनावद में उनका अभूतपूर्व प्रवेश हुआ, उनकी सरलता, सहजता देखकर मन प्रसन्नता से भर जाता रहा । ऐसे महान तपस्वी संत जिन्होंने अपने शरीर की आयु के 61 वर्ष में से 41 वर्ष दिगम्बरत्व की सेवा में लगाए व दिगम्बरत्व के नवनीत संलेखना समाधि को श्रेष्ठतम ऊंचाईयों प्रदान की ऐसे महान गुरुवर के चरणों में अपनी विनम्र विनयांजलि समर्पित करता हूँ ।













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