जैनतीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ आचार्य भगवन संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य कुंडलपुर में विराजमान हैं। इस अवसर पर अभिनव आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आगम के माध्यम से बहुत सारा विषय सूक्ष्मता को लेकर वर्णन मिलता आगम में वह आगम की रचना दिव्य ध्वनि के आधार से गणधर परमेष्ठी द्वारा आगम की रचना होती है। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…
कुंडलपुर ( दमोह)। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैनतीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ आचार्य भगवन संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य कुंडलपुर में विराजमान हैं। इस अवसर पर अभिनव आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आगम के माध्यम से बहुत सारा विषय सूक्ष्मता को लेकर वर्णन मिलता आगम में वह आगम की रचना दिव्य ध्वनि के आधार से गणधर परमेष्ठी द्वारा आगम की रचना होती है और द्वादशांग धीरे-धीरे काल के प्रभाव से समझ लो धीरे-धीरे अपनी योग्यता को लेकर कर्म के उदय के कारण वह श्रुत राग को प्राप्त होता हुआ आया है लेकिन वस्तुतः क्षीरसागर का वह जल, जिसमें से आप एक लोटा भरकर ले आए तो वह जल क्षीरसागर का ही जल माना जाता है ।
उसी प्रकार गणधर परमेष्ठी के पश्चात उक्तरवर्ती आचार्यों के माध्यम से वह क्षीर सागर की धारा बहती हुई यहां तक आई और आचार्य महाराज उनको आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के माध्यम से उनके मुखारविंद से और उनके अनुभव के माध्यम से आचार्य गुरुदेव को प्राप्त हुआ। बहुत अद्भुत पुण्य का उनका योग रहा और उन्होंने आचार्य ज्ञान सागर महाराज को उनकी उपस्थिति में भी और उनके समाधिस्थ होने के उपरांत भी उनको हृदय में बिठाया और निर्भीक होकर के निर्भीकता के साथ ज्ञान का अर्जन करते हुए ज्ञान सागर महाराज के माध्यम से प्राप्त जो रत्नात्रय की निर्दोष आराधना करते हुए रत्नात्रय को निर्मल बनाया है।
अपने जीवन काल में जो ज्ञान का अर्जन उन्होंने किया है वह शायद ही कोई और भी कर सकेगा। हमारे पास है क्या आप लोग कहते महाराज आप भी हमें भी सूत्र दे दो सूत्र के रचयिता आचार्य हुआ करते हैं और उन्होंने जो भी सूत्रों का निर्माण किया है, उसमें से किसी भी सूत्र को आप अपनी बुद्धि का विषय बना लो उपयोग के माध्यम से उन सूत्रों की आराधना उन सूत्रों की गहराई तक पहुंचने का पुरुषार्थ हमें भी करना है। आप लोगों के लिए भी करना बहुत अद्भुत विषय पूज्यपाद स्वामी ने स्पष्ट किया है कि प्रसंग धर्म ज्ञान का है। आप लोग सर्वार्थ सिद्धि का अवलोकन कर सकते हैं। मुझे वह प्रसंग स्मरण में आ रहा है कहां तक मैं आपके सामने रख पाऊं यह अलग वस्तु किंतु क्षयोपशम है। आपके पुण्य के उदय से वह भाव आपके सामने रख पाऊंगा, आज्ञा विशेष धर्म ज्ञान का विषय है।
पूज्यपाद स्वामी कह रहे हैं कि उपदेशता आवावात उपदेशता का अभाव हम लोगों के लिए तो सर्वार्थ सिद्धि का निर्माण करके महान उपकार किया है और वे उमा स्वामी का तत्वार्थ सूत्र जो उमा स्वामी के द्वारा रचित है। आदि टीका उनके द्वारा लिखी गई है और सर्वार्थ सिद्धि में अपने आप में लघुता का एक भाव प्रकट करते हुए लिखा है। सर्वार्थ सिद्धि में नवें अध्याय में धर्म ध्यान का प्रसंग आया। धर्म ध्यान के प्रसंग में बात रखी हेतु और दृष्टांत इन दोनों का अभाव हो जाता है। हम हेतु नहीं दे पाते हैं जिस समय और दृष्टांत प्रस्तुत नहीं करते उस समय इसको धर्म ज्ञान का विषय बनता है। हमें आज्ञा का पालन करना है कहां पर करना है इसका कोई अंत है नहीं।
जब श्रुत का अंत नहीं उपलब्ध आगम पुण्य के उदय से उपलब्ध हुआ है उसको हमें बिना किसी संघ के उसकी आस्था का विषय बनाना चाहिए।आचार्य श्री ने अच्छा दृष्टांत दिया था फर्श की दरी जिसको बोलते हजारों व्यक्ति बैठे हैं और एक व्यक्ति के हाथ में हिमखंड है छोटा सा बर्फ का एक टुकड़ा है वह एक दूसरे के हाथ में वह परिवर्तित होता हुआ अंतिम व्यक्ति के हाथ में पहुंच जाए शायद वह बर्फ की डली देखने नहीं मिलेगी। हाथ गीला मिलेगा यह आगम धीरे-धीरे यहां तक पहुंचा है हमारे हाथ गीले हैं हाथ सूख भी जाएं तो मन हमारा गीला बना रहेगा। प्रत्येक व्यक्ति का मन यदि शीतलता का अनुभव करता है तो निश्चय हृदय में भी वह आगम विद्ममान है।













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