समाज के लोग अपने अध्यक्ष बनने की चाह में, अपने पद की चाह में नई-नई संस्थाएं खड़ी कर रहे हैं। समाज को इसे रोकना चाहिए। आज जो नई-नई संस्थाएं बन रही हैं, वह महत्वाकांक्षाओं के कारण बन रही हैं।
गेस्ट राइटर
अशोक बड़जात्या, इंदौर
संस्थाएं तो बहुत सारी हो सकती हैं क्योंकि उनकी कार्य शैली भिन्न होती है। उनका कार्य क्षेत्र भी अलग होता है। मान लीजिए हम महासमिति हैं तो हम सामाजिक कार्य करते हैं। एक महासभा है, वह धार्मिक उन्नति का काम करती है। एक तीर्थ क्षेत्र कमेटी है, वह तीर्थ का काम करती है। कुल मिलाकर हर क्षेत्र की एक संस्था हो तो उसमें कोई तकलीफ नहीं है परंतु उसकी देखा- देखी लोग अन्य संस्थाएं बना लेते हैं, तो वह गलत है। समाज के लोग अपने अध्यक्ष बनने की चाह में, अपने पद की चाह में नई-नई संस्थाएं खड़ी कर रहे हैं। समाज को इसे रोकना चाहिए। आज जो नई-नई संस्थाएं बन रही हैं, वह महत्वाकांक्षाओं के कारण बन रही हैं। ये संस्थाएं समाज को विभिन्न दिशा में भटका रही हैं। इसमें देखा जाए तो सरकार से कौन बात करेगा। अगर एक संस्था होगी तो सरकार से बात भी करी जाए। एक पद, एक व्यक्ति, एक संस्था का जहां तक सवाल है तो व्यक्ति अपने अनुभव का लाभ अलग-अलग जगह पर दे सकता है। वह एक ही काम करने वाली अलग-अलग संस्थाओं में अलग-अलग पद पर है तो यह अनुचित है। व्यक्ति अगर बहुमुखी प्रतिभा का धनी है तो वह अपनी प्रतिभा का लाभ सब जगह दे सकता है।













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