अनेकों साहित्य कृतियों के साथ सैकड़ों दिगम्बर मुनियों व हजारों चैतन्य कृतियों के प्रेरणा पुंज आचार्य विद्यासागरजी ने जैन दर्शन के प्रति जो समर्पण किया है वह स्तुत्य है, शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है। पढ़िए राजेन्द्र जैन ‘महावीर’, सनावद का विशेष विनयांजलि आलेख…
सनावद। जैन समाज हो या जैनेतर समाज सभी के बीच यदि ‘आचार्यश्री’ शब्द निकल जाए तो आम जनमानस के मन में एक ही छवि उभरती है वह है आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज की। आमजन जिनको एक झलक पाने को घण्टों कतार में इंतजार करते हैं। अनेक सेलीब्रिटी, राजनेता उनकी चर्चा अनुसार अपना कार्यक्रम सेट करते हैं, मीलो पैदल चलते है, एक मधुर मुस्कान के पीछे दीवाने हो जाते है, ऐसे आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के जीवन में आखिर ऐसा क्या था, यह जानने के लिए हमें अपनी चर्चा के साथ उनका अभूतपूर्व साहित्य जो उन्होंने मौलिक रुप से सृजन किया है उसे पढ़ना बहुत आवश्यक है। अनेकों साहित्य कृतियों के साथ सैकड़ों दिगम्बर मुनियों व हजारों चैतन्य कृतियों के प्रेरणा पुंज आचार्य विद्यासागरजी ने जैन दर्शन के प्रति जो समर्पण किया है वह स्तुत्य है, शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है। आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज ने उन्हें कड़ी परोक्षा में उत्तीर्ण पाया और 30 जून 1968 को दिगम्बर मुनि दीक्षा प्रदान की तब कोई नहीं जानता था कि वे जैन धर्म के समर्थ आचार्य बनेंगे। आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज ने 22 नवंबर 1972 को मुनिश्री विद्यासागरजी को आचार्य पद प्रदान करते हुए स्वयं उनका निर्यापकत्व स्वीकार किया, यह घटना जैन इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। आचार्य पद व शिष्यत्व दोनों पदों से न्याय करते हुए उन्होंने ज्ञानसागरजी महाराज की ऐसी सेवा की जो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाती है।
संत शिरोमणि की समाधि मेरी अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
17 फरवरी 2024 की मध्यरात्रि 2.35 बजे छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरि तीर्थ पर आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने सल्लेखना समाधिपूर्वक इस नश्वर देह को त्यागा तो संपूर्ण राष्ट्र में शोक की लहर छा गई। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय अधिवेशन में आचार्यश्री की समाधि को अपूरणीय व व्यक्तिगत क्षति बताया। रुंधे गले से भावुक होकर उन्होंने कहा कि मैं विगत कुछ माह पहले ही उनके दर्शन लाभ लेकर आया था। तब मुझे नहीं पता था कि उनके दर्शन अब दोबारा नहीं होंगे। उल्लेखनीय है कि विगत 5 नवंबर 2023 को चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आचार्यश्री के दर्शन कर राष्ट्र के लिए मार्गदर्शन लिया था । 55 वर्षों से दिगम्बरत्व का अनुषीलन कर ‘मूकमाटी’ जैसा महाकाव्य प्रदान करने वाले आचार्य विद्यासागरजी आज ‘आचार्यश्री’ शब्द का पर्याय बन गए है। यह उपलब्धि एक दिन की नहीं लगातार 55 वर्ष दिगम्बरत्व की साधना की है व लगातार आचार्य पद पर 50 वर्षों की तपस्या के साथ अपनी चर्या के प्रति न्याय की पराकाष्ठा है जो उन्हें जगतपूज्य ‘आचार्यश्री’ बनाती थी ।
दिगम्बर जैन धर्म की अनादिकालीन परम्परा में दिगम्बर साधु का स्वरुप, उनकी चर्चा, उनका आचार विचार आदि सभी पर विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है । वर्तमान युग उस वर्णन को पढ़कर अपनी बुद्धि, विवेक से मूल्यांकन करता है, सबके अपने-अपने तरीके होते है । वस्तु का स्वरुप समझाने वाले जैन दर्षन में सबसे पहले कहा जाता है कि सबसे पहले स्वयं को देखों, स्वयं को समझो, तभी आप इस जैन दर्षन व संसार को समझ सकते हो। 10 अक्टूबर 1946 शरद पूर्णिमा की रात्रि में जन्में विद्याधर के बारे में जब हम पढ़ते है तो हमें बड़ा आश्चर्य होता है, वर्तमान समय का ऐसा परिवार जहां परिवार के सारे के सारे सदस्य माता-पिता, भाई-बहन सभी दिगम्बर पथ के अनुयायी हुए हो, ऐसा देखने-सुनने को नहीं मिलता।
कन्नड़ भाषी ‘विद्याधर’ वास्तव में विद्याधर थे जिन्होंने अपने गुरु आचार्य ज्ञानसागरजी के कथन “पढ़ लेना, तुम भी पढ़ लेना, अभी तक पढ़ने वाले तुम्हारे जैसे कई ब्रह्मचारी और भी आये है, लेकिन सब पढ़कर चले गए रुका कोई नहीं।” अपने गुरु का यह कथन सुनकर जीवन में कुछ करने निकले विद्याधर ने अपना संकल्प इस तरह व्यक्त किया कि “मैं आज से जीवन पर्यन्त वाहन/यान आदि सभी आवागमन के साधनों का त्याग करता हूँ, जितना चलूंगा अब आपकी आज्ञा से आपके पीछे-पीछे ही चलूंगा। अपनी कृपा बनायें।” इतने कठोर संकल्प को दृढ़ निश्चय के साथ सहज में ले लेने वाले संत षिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज लोकपूज्य थे। जैन दर्शन की आन-बान-शान थे, उनका यह संकल्प न केवल गुरु के प्रति निष्ठा को प्रदर्षित करता है। बल्कि यह संदेष देता है कि यदि जीवन में कुछ भी पाना है तो गुरु शरण में समर्पित हो जाओं, सौदेबाजी मत करों। समर्पण में इतिहास बनता है, सौदेबाजी समाप्त कर देती है।सक्षम गुरु के समर्थ षिष्य थे समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज 1969 से नमक, बूरा, शक्कर आदि का त्याग कर दिया था स्वर्ण के समान चमकने वाले गुरुवर आचार्यश्री दीक्षा के एक वर्ष बाद ही नमक, बूरा, शक्कर आदि का त्याग कर दिया था। यह उनकी दिगम्बरत्व के प्रति निष्ठा व समर्पण का परिचायक था। आपने 1985 में चटाई का भी त्याग के बाद ही 1994 में सभी वनस्पतियों को त्याग कर एक अलौकिक संत बने थे । आपको देखकर अनेक श्रावक-श्राविका बिना कहे त्याग करने को आतुर हो जाते थे। आपकी मधुर मुस्कान के दीवाने युवा अपना सब कुछ (संसार की भाषा में) छोड़कर अपना ही सब कुछ (आत्मज्ञान) पाने को दिगम्बरत्व स्वीकार कर लेते थे ।
साहित्य के शिरोमणि थे आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज
75 से अधिक समर्थ कृतियों को जन्म देने वाले आचार्यश्री साहित्य के षिरोमणि थे, कन्नड़, मराठी, बंगला, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंष, हिन्दी, अंग्रेजी के कुषल अध्येता ने जब कलम चलाई तो जो निकला वह नवनीत आज भी जन-जन के अधरों पर है व आचार्य विद्यासागरजी महाराज ऐसे पहले आचार्य थे जिनके साहित्य, व्यक्तित्व, कृतित्व पर लगभग सौ से अधिक पी.एच.डी. की गई है। आपके द्वारा रचित ‘मूकमाटी’ महाकाव्य तो विश्विद्यालयों के कोर्स में सम्मिलित होकर अनेक अध्येताओं का प्रिय विषय है। वे मूकमाटी में कहते है ‘राख’ का उलट ‘खरा’ होता है व ‘राही’ का उलट ‘हीरा’ होता है। ये उनको अभिव्यक्ति अनेकजनों को ‘खरा’ बनाने व ‘हीरा’ बनाने की ओर अग्रसर करती है। आचार्यश्री ने अपने नश्वर शरीर को भले ही ‘राख’ बना लिया हो लेकिन वे अपने आपको ‘खरा’ बनाकर ही हमारे बीच से गए। वे अध्यात्म पथ के ‘राही’ थे और उसी पथ के ‘हीरा’ बन गए। यह उनकी कथनी करनी की साम्यता का परिचायक है।
बुन्देलखण्ड के जन-जन में विराजमान थे आचार्य विद्यासागरजी महाराज
आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज की प्रिय भूमि बुन्देलखण्ड व मध्यप्रदेश हीरही है। आचार्यश्री से जब पूछा गया कि आप बन्देलखण्ड में क्यों ज्यादा रहते हैं तो उन्होंने कहा कि आप अपनी दुकान कहां खोलना चाहेंगे तो उत्तर आया कि जहां ग्राहक ज्यादा हो तो आचार्यश्री ने कहा कि बुन्देलखण्ड में हमारे ग्राहक ज्यादा है इसलिए हमें बुन्देलखण्ड प्रिय है। बुन्देलखण्ड के प्राचीन तीर्थ द्रोणगिरि, नैनागिरिजी, आहारजी, पपौराजी, कुण्डलपुर आदि ऐसे तीर्थ है जो घनघोर जंगल में है। ये सभी तीर्थ आचार्यश्री की पसंदीदा जगह थी। नैनागिरिजी को सिद्धशिला को ‘मूकमाटी’ पूर्ण कराने का सौभाग्य प्राप्त है। प्रकृति प्रिय आचार्यश्री के सबसे ज्यादा शिष्य आज भी बुन्देलखण्ड के ही हैं। जिन्होंने आचार्यश्री के प्रति अपना सब कुछ समर्पित किया है। ग्राम ग्राम, गली-गली जैन जैनेत्तर समाज भी आचार्यश्री की एक मुस्कान के पीछे बुन्देलखण्ड दीवाना बना हुआ था।
मांस निर्यात विरोध व गौशाला के प्रेरक
मांस निर्यात के विरोध में आवाज उठाकर सबसे पहले पशुओं के संरक्षण की आवाज आचार्यश्री ने पुरजोर तरीके से उठाई व गौशालाएं खोलने का आह्वान किया था। उनकी प्रेरणा से देश में सैकड़ों गौशालाएं संचालित है। मध्यप्रेदश सरकार ने तो आचार्यश्री विद्यासागर गौ संवर्धन बोर्ड का गठन किया है। जिसके तहत गायों का संरक्षण किया जाता है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को अनुदान व गाय प्रदान की जाती है। बोनाबरहा में “शांतिधारा” दुग्ध योजना एक महत्वपूर्ण योजना है। आचार्यश्री ने जहां मांस निर्यात का विरोध किया वहीं उसके उपाय बताते हुए गायों के संरक्षण के कारगर उपाय प्रस्तुत किये जो लाखों-करोड़ों जीवों के प्रति करुणा का कारण है। धन्य थे ऐसे युग प्रवर्तक आचार्यश्री। जिन्होंने प्राणी मात्र के प्रति अपने करुणा भाव को प्रदर्शित करते हुए करोड़ो मूक पशुओं का उपकार किया।
संस्कारों के साथ हिन्दी और आयुर्वेद के हिमायती थे आचार्यश्री
बच्चों में संस्कृति के संस्कार प्रवाहमान हो इस हेतु प्रतिभास्थली जैसी संस्थाओं का गठन व ‘इण्डिया नहीं भारत कहो’ हिन्दी बोलो, हिन्दी के संरक्षण के प्रयास आचार्यश्री की दूरगामी सोच को प्रदर्शित करती है। भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन द्वारा शिक्षा नीति के बारे में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के सुझावों को शामिल किया गया। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा में शिक्षा को प्रधानता दी गई है जिसमें आचार्यश्री का मातृभाषा अभियान सार्थक हुआ है। पूर्णायु आयुर्वेदिक विष्वविद्यालय के माध्यम से भारतवर्ष की प्राचीन चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के साथ प्रतिभा स्थली के माध्यम से अनेक प्रतिभाओं को समुत्रत बनाने का कार्य हो रहा है। राष्ट्रकल्याण की सार्वभौमिक सोच रखने वाले दूरदृश समाधिस्थ आचार्यश्री को सादर नमन है, वंदन है। जिन्होंने स्व कल्याण के साथ राष्ट्र कल्याण का भाव रखते हुए समूचे राष्ट्र का मार्गदर्शन किया।
हथकरघा से अहिंसा का शंखनाद
आचार्यश्री ने हथकरघा उद्योग को प्रोत्साहित कर अहिंसा से आजीविका को जोड़ा, आज अहिंसा का शंखनाद हथकरघा उद्योग से कर भारतवर्ष को एक नई दिशा प्रदान की है जो संपूर्ण देश में अच्छा प्रतिसाद दे रही है। आज इस योजना से हजारों हाथ जुड़े है व तेजी से इस अहिंसक योजना को आमजन स्वीकार कर रहे है। ऐसे युग प्रवर्तक आचार्य भगवन ने अब तक 120 मुनिदीक्षा, 172 आर्यिका दीक्षा सहित कुल 443 दीक्षा प्रदान की है, सैकड़ों बाल ब्रह्मचारी भैया, दीदी, प्रतीक्षा में है। लाखों श्रावकों ने अनेक प्रतिमा धारण की है, त्याग मार्ग को स्वीकार किया है। ऐसे आचार्यश्री की कुछ प्रेरक कथन जो हमें उनके तलस्पर्शी ज्ञान को प्रदर्शित करते है-
■ जब तक ‘देह’ के प्रति ‘नेह’ है तब तक ‘गेह’ भी है, जब तक ‘नेह-देह-गेह’ है तो संदेह भी है, और जब तक ‘संदेह’ है तब तक ‘विदेह’ नहीं हो सकता ।
■ ‘वेतन’ वाले ‘वतन’ की ओर कम ध्यान दे पाते हैं, और ‘चेतन’ वाले ‘तन’ की ओर कब ध्यान दे पाते है।
■ तुम दिन रात बच्चों का ही नाम लेते रहते हो, इसलिए बच्चों वाले ही बने रहते हो ।
■ एक में ‘शांति’ है अनेक में ‘अशांति’ हैं, इसलिए एक (आत्मा) का ही चिंतन करें ।
■ ‘मिथ्या दृष्टि’ की भक्ति का लक्ष्य ‘पद प्रतिष्ठा’ होती है।
■’सम्यकदृष्टि की भक्ति का लक्ष्य ‘मुक्ति’ होती है।
■ एक किनारे से दूसरे किनारे पर जाना आसान है लेकिन मझधार से किनारे पर जाना बहुत मुश्किल है।
■ विवेकी खड़े-खड़े घर से निकल जाते है, और अविवेकी (अज्ञानी) को निकाल दिया जाता है।
■ धर्म की शुरुआत मंदिर से नहीं घर से होती है।
■ बड़ी विडम्बना है, पषुओं के अंदर तो इंसानियत आ रही है, लेकिन मनुष्यों में पशुता आ रही है।
■ भले ही उपवास-एकासन न हो सके तो मत करना लेकिन किसी प्राणी के प्रति दुराभाव नहीं करना।
जगत के उपकारी संत के रुप में वे संत शिरोमणि थे, अनेक उपाधियां उनके आगे इसलिए बौनी हो जाती हैं क्योंकि वे मानते हैं कि ये उपाधियां ‘व्याधियां’ है। अपने गुरु द्वारा प्रदत्त उपाधि के साथ न्याय करते हुए वे अपने आचार्य पद को इतना प्रतिष्ठित किए हुए थे कि किसी के मुख से यदि ‘आचार्यश्री’ शब्द निकले तो मन-मस्तिष्क में आचार्यश्री विद्यासागरजी की छवि ही ध्यान आती है, ऐसे महान आचार्य का चातुर्मास जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ तो म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सहित उनका पूरा मंत्रिमण्डल उनकी अगवानी में कई किलोमीटर नंगे पैर कमण्डल थामे चला।
भोपाल का वह चातुर्मास
इतिहास के स्वर्णाक्षरों में लिखा गया जब भारत देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने अनेक मंत्रियों के साथ आचार्य संघ के दर्शन को पहुंचे थे । उल्लेखनीय है कि म.प्र. की प्रमुख राजनेता, पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती जी ने आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का शिष्यत्व स्वीकार कर उनके मार्गदर्शन में परिवार का त्याग किया है व उमा भारती दीदी नाम पाया है जो सिद्ध करता है कि आचार्यश्री जैन ही नहीं जन-जन के राष्ट्रसंत थे जिनका अभूतपूर्व त्याग, तपस्या उनके मुख मण्डल पर स्पष्ट दिखाई देता था ।
ऐसे युग प्रमुख आचार्य विद्यासागरजी ने अपने जीवन के 55 वर्ष से अधिक दिगम्बर मुनि के रूप में पूर्ण कर चुके हैं। हमारा यह सौभाग्य है कि हम उस युग में जन्में है जो आचार्यत्व श्री विद्यासागरजी का युग था। जिसमें हमें उनका प्रत्यक्ष रूप से आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।
5 अक्टूबर 2019 में शिक्षक संदर्भ समूह के श्री दामोदरजी जैन द्वारा नेमावर में आयोजित विश्व शिक्षक दिवस पर मुझे संचालन करने व इन्दौर संभाग के तत्कालीन संयुक्त संचालक मनीष वर्मा के हाथों सम्मानित होने व आचार्यश्री के कक्ष में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
अंत में आचार्यश्री का एक कथन –
“दुनिया को समझाना बहुत आसान है अपने आपको समझाना बहुत कठिन है।”













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