जैन धर्म और संस्कृति में जैन तीर्थों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। धर्म का प्राचीन इतिहास बताने में तीर्थों की अहम भूमिका होती है। तीर्थ मनुष्य की आत्मा को निर्मल बनाते हैं। तीर्थों के जरिए हम अतीत को देख सकते हैं। तीर्थों की स्थापना का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक ही रहा है। लेकिन वर्तमान में कई जैन तीर्थ दुर्दशा का शिकार हो रहे हैं। तीर्थ आज हर श्रावक से पुकार कर रहे हैं कि उनकी संभाल जल्द से जल्द करें। श्रीफल जैन न्यूज भी जैन तीर्थ स्थलों की बिगड़ती दशा को लेकर चिंतित है। इसी को लेकर एक विशेष शृंखला की शुरुआत की जा रही है, ताकि जैन समाज में तीर्थ स्थलों को लेकर जागृति आ सके। आज इस इसकी पहली कड़ी में पढ़िए राखी जैन की विशेष रिपोर्ट ।
जैन धर्म की अवधारणा त्याग, तपस्या और साधना की है, लेकिन विगत कुछ समय से हमारे तीर्थ स्थल भौतिकता की दौड़ में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं. आए दिन नए-नए निर्माण हो रहे हैं, तीर्थ क्षेत्रों पर सुविधाओं के नाम पर बड़ी बड़ी धर्मशाला बन रही है, सभागार बन रहे हैं, बेशक ये सब समाज को बेहतर सुख-सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए है, लेकिन क्या तीर्थ स्थलों पर ये सुविधाएं सुचारू हैं, ये बात कोई नहीं जानता. कई बार यात्रियों की शिकायतें सामने आती हैं की लंबी यात्रा करके पहुँचने के बाद बुनियादी सुविधा का आभाव भी झेलना पड़ता है. इसी विषय को समाज के जिम्मेदार लोगों के सामने रखने के लिए श्रीफल जैन न्यूज ने एक पहल की है. हमारा प्रयास रहेगा की इस श्रृंखला में तीर्थ क्षेत्रों के अधिकारियों, ट्रस्टी और समाज के जागरूक और बुद्धिजीवियों के विचार और सुझाव आपके सामने रखें. इस श्रृंखला में हम ‘जैन तीर्थ क्षेत्रों की सात्विकता एवं प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए, प्रबंधकों को पुनर्विचार की आवश्यकता’ पर भी बात करेंगे और किस तरह जैन तीर्थों की सार- संभाल की जाए, इस पर भी जिम्मेदारों से बात करेंगे. नई पीढ़ी, जैन तीर्थों पर जाकर जैन धर्म और जैन संस्कृति को अच्छे से समझ सकें इसके लिए भी किस तरह के प्रयासों की आवश्यकता है इस पर भी बात करेंगे.
आज सबसे पहले विचार पत्रकार, लेखक संजीव जैन के हमारे सभी तीर्थकर, चक्रवर्ती सम्राट या समकक्ष थे जिन्होंने राजमहलों की भौतिकता और सुविधाएँ छोडकर अजर-अमर पद प्राप्त करने के लिए ही, इन तीर्थ क्षेत्रों को, तपस्या और साधना करने के लिए चुना था। यह बात हमारे तीर्थक्षेत्रों के कण कण में मूलभूत रूप से दृष्टिगोचर होना चाहिए।
हमारे करीब करीब सभी तीर्थक्षेत्रों पर उपरोक्त सिद्धांत के दर्शन दुर्लभ पाए जा रहे हैं और व्यावसायिकता हावी है, इसके लिए गृहस्थ और त्यागी सभी जिम्मेदार कहे जा सकते हैं। बडे-बडे निर्माणों और सुविधाओं से युक्त मंदिर और धर्मशालाएँ, इन तीर्थ क्षेत्रों के लिए खतरा बन गई है क्योंकि इन सभी निर्माणों और सुविधाओं को देने के लिए तीर्थक्षेत्र कमेटियों को, अन्य जाति के लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है परिणाम स्वरूप एक बडा अजैन वर्ग (जो जैन सिद्धांतों को नहीं मानता है) तीर्थ क्षेत्रों पर रोजगार मिलने से, निवास करने लगता है और हमारे ही द्वारा उनका पालन पोषण होने लगता है जो कालांतर में उस क्षेत्र का निवासी और वोटर बन जाता है और वहाँ राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही तरह के दबाव बनाने में सक्षम हो जाता है।
तीर्थ क्षेत्रों पर जो कमेटियों बनती है या बनवाई (?) जाती है वह सभी पदाधिकारी क्षेत्र पर निवास नहीं करते हैं बल्कि कभी-कभी वहाँ आकर क्षेत्र के विकास का अवलोकन करते हैं। कितना दान और कितना खर्च इसका हिसाब कभी समाज को नहीं मिलता है। यह सभी पदाधिकारी अपने अपने नगरों में पूर्ण सुविधायुक्त जीवन जीने के आदी होते हैं और ऐसा ही जीवन वह तीर्थ क्षेत्र पर चाहते हैं उनको सात्विकता और सादगी से जीवन जीने की शपथ सर्वप्रथम दिलानी चाहिए और सख्ती से पालन करवाना चाहिए इससे जैन संस्कृति और व्यवहार तीर्थ क्षेत्रों पर दिखाई देने लगेंगे।
हमें क्या करना चाहिए ? सभी तीर्थ क्षेत्र, जैन संस्कृति के संवाहक एवं दर्शनीय स्थल है आने वाली पीढ़ी को जैन धर्म और संस्कृति की वास्तविकता से अवगत कराने के लिए इनका संरक्षण एवं सुरक्षा दोनों जरूरी है इसलिए हमें ऐसे तीर्थ क्षेत्रों पर जैन समाज के अथवा जैन सिद्धांतों को मानने वाले लोगों को बसाने का प्रयास करना चाहिए इसके लिए जो जैन लोग सुदूर गाँव एवं आर्थिक अभावों में रहते हैं उनके लिए इन क्षेत्रों पर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रहने की सुविधा उपलब्ध कराना होगा। लोकतांत्रिक सरकारों की तरह ऐसे, गरीबी रेखा के नीचे आने वाले समाज के लोगों के लिए वन बीएचके फ्लैट बनाकर दिए जा सकते हैं साथ ही साथ स्कूल, कॉलेजों, हॉस्पिटल एवं रोजगार के लिए अहिंसक फैक्ट्रियों की स्थापना की जा सकती है इससे जैन समाज का विकास होगा और हमारे पवित्र स्थलों पर जैन समुदाय के लोगों की संख्या में वृद्धि भी होगी।
आचार्य 108 श्री विद्यासागर महाराज द्वारा प्रेरित, गौशाला, हथकरघा केंद्रों के साथ-साथ प्राकृतिक चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं से युक्त चिकित्सा केंद्रों का भी निर्माण किया जाना चाहिए जिससे जैन और अर्जन दोनों तरह के लोग हमारी संस्कृति और सभ्यता से परिचित हो सकें।
हम आभारी हैं संजीव जैन जी के विचारों के साथ ही राजेश जैन दद्दू के जिन्होंने हमारा परिचय संजीव जैन जी से करवाया ।













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