श्री दिगम्बर जैन अजितकीर्ति गिरि साबला में 6 दिसम्बर से 8 दिसम्बर 2023 तक आचार्य अजितसागरजी महाराज बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा एवं भव्य स्मारक प्रतिष्ठा मंगल महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है ।महोत्सव पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य शिरोमणी 108 श्री वर्धमानसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य और आशीर्वाद से हो रहा है। आज सुबह आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का साबला नगर से श्री अजीतकीर्ति गिरी पर मंगल प्रदार्पण हुआ। आचार्य श्री के आगमन के बाद श्री जी का पंचामृत अभिषेक , नित्य नियम पूजन हुई। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट ।
इंदौर। श्री दिगम्बर जैन अजितकीर्ति गिरि साबला में 6 दिसम्बर से 8 दिसम्बर 2023 तक आचार्य अजितसागरजी महाराज बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा एवं भव्य स्मारक प्रतिष्ठा मंगल महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है ।महोत्सव पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य शिरोमणी 108 श्री वर्धमानसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य और आशीर्वाद से हो रहा है। आज सुबह आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का साबला नगर से श्री अजीतकीर्ति गिरी पर मंगल प्रदार्पण हुआ। आचार्य श्री के आगमन के बाद श्री जी का पंचामृत अभिषेक , नित्य नियम पूजन हुई। नंदी विधान किया गया इसके पश्चात ध्वजारोहण श्री दिनेश श्रीमती हेमलता बेड़ा परिवार के द्वारा, विजय द्वार का लोकार्पण श्री भंवरलाल भोरावत परिवार के द्वारा तथा आचार्य श्री अजित सागर पंडाल उद्घाटन श्री महेंद्र कुमार,ओमप्रकाश ,नरेंद्र भोरावत परिवार द्वारा किया गया । इसी परिवार द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी एवम आचार्य श्री अजित सागर जी के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया गया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन एवम् जिनवाणी भेट का सौभाग्य श्री गणेश लाल सराफ परिवार को प्राप्त हुआ। कमेटी के पदाधिकारियों द्वारा आचार्य श्री को अध्र्य समर्पित कर प्रतिष्ठाचार्य पंडित हँसमुख शास्त्री,विनोद शास्त्री,पंडित भागचंद शास्त्री ब्रह्मचारी गजू भैय्या का स्वागत किया। दोपहर को सभी इंद्र का सकलीकरण कर दिग्बंधन किया गया दोपहर को याग मंडल विधान की पूजन हुई। शाम को श्री जी की आरती पश्चात आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की आरती हुई रात्रि में शास्त्र सभा के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए

श्री अजित कीर्ति गिरि अब तीर्थ का रूप लेगा
इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज जी ने कहा की हम सब का सौभाग्य है कि श्री ऋषभ देव भगवान से लेकर अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी तक 24 तीर्थंकरों की भारत भूमि पर दिव्य देशना गणघरो के माध्यम से प्रगट हुई इस दिव्य देशना शास्त्रों से हम सभी को मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा ।अरिहंत देव पंच परमेष्ठी में प्रथम स्थान पर है, वही आचार्य परमेष्ठी तृतीय स्थान पर होते हैं। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होकर समाज को संयम का उपहार दिया उन्होने संयम पथ का परिपालन किया। श्री आदिनाथ भगवान के समान वह भी सर्वप्रथम आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए ।आचार्य श्री शांति सागर जी ,आचार्य श्री वीर सागर जी, आचार्य श्री शिव सागर जी, आचार्य श्री धर्म सागर जी, आचार्य श्री अजीत सागर जी परंपरा के सभी बाल ब्रह्मचारी आचार्य हैं। साबला आने के बाद चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजित सागर जी का स्वास्थ्य खराब हुआ ,जैसे-जैसे आचार्य श्री का स्वास्थ्य गिर रहा था उनमें आध्यात्मिक स्वास्थ्य में आत्म बल तेज की वृद्धि हो रही थी। दीक्षा गुरु आचार्य धर्म सागर जी की समाधि के बाद हमें गुरु की कमी महसूस हो रही थी, पंडित हसमुख जी हमारे पास आचार्य अजीत सागर जी का एक पत्र लेकर आए। उस पत्र का आशय यही था कि मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं, एक आचार्य के लिखे पत्र शिष्य मुनियों के लिए आदेश होता है उसका परिपालन कर सभी साधु आचार्य अजीत सागर जी के दर्शन सेवा हेतु पधार गए ,हमें आचार्य धर्म सागर जी महाराज की तरह आचार्य श्री अजित सागर जी की सेवा करने का अवसर मिला । आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज का स्वास्थ्य ठीक नहीं था ,उनकी भी सेवा करने का एक पुण्य अवसर हमें प्राप्त हुआ।

आचार्य श्री अजित सागर महाराज महाज्ञानी थे , गुरुओं से अज्ञान का अंधकार दूर होकर प्रकाश ही प्रकाश रूपी ज्ञान मिलता है । आचार्य श्री आध्यात्मिक साधना की और बढ़ चले और साबला में उनकी समाधि हुई ।आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज हमारे निर्बल कंधो पर बंद लिफाफे में परंपरा के आचार्य पद का भार सोप गए । यह आचार्य श्री का आशीर्वाद है ,कि हम उस भार को सम्हाल सके । हमारा यह पुण्य है कि आचार्य के दीक्षित शिष्य मुनि श्री चिन्मय सागर जी और आर्यिका श्री शीतल मति की प्रेरणा से नवोदित समाधि स्थल पर हमको उनके बिम्ब की प्रतिष्ठा का अवसर मिला । अब श्री अजित कीर्ति गिरि तीर्थ का रूप लेगा
आप सभी को प्रतिष्ठा महोत्सव में आने का पुण्य अवसर प्राप्त हुआ है । इस तीर्थ से आचार्य श्री अजीत सागर जी की कीर्ति को आप हृदय में बसा कर रखें और जीवन को कीर्तिमय बनाये, आपकी देव शास्त्र गुरुओ के प्रति श्रद्धा वृद्धि को प्राप्त हो । जो दुर्लभ मनुष्य जीवन असीम पुण्य से प्राप्त हुआ उसमें गुरुओं का सानिध्य प्राप्त कर आप मनुष्य जीवन को सार्थक करे।













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