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विशेष प्रवचन माला में अंतिम दिन मां विषय पर प्रवचन : जीवन में मां का स्थान ईश्वर से बढ़कर, उसी ने जन्म दिया है ईश्वर को भी अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज


श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की विशेष प्रवचन माला के अंतिम दिन अंजनी नगर के पार्श्व संत सदन में कहा कि जीवन में दुख, अशांति है। घर का वास्तु ठीक नहीं है, ग्रहों की दशा ठीक नहीं चल रही है तो मां के चरणों का स्पर्श कर लेना और अगर मां नहीं है तो मां के चरण बनाकर घर में रख लेना। सुबह-सुबह उनका स्पर्श कर लेना, सब दुख दूर हो जाएंगे।पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….


इंदौर। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की विशेष प्रवचन माला के अंतिम दिन अंजनी नगर के पार्श्व संत सदन में कहा कि मां से बढ़कर संसार में ईश्वर भी नहीं है। ईश्वर को जन्म देने वाली भी मां ही है। परमात्मा की भक्ति तुमसे हो न हो लेकिन सुबह-सुबह मां के चरणों का स्पर्श जरूर कर लेना क्योंकि दुनिया में मां का रिश्ता सबसे पवित्र और निर्मल होता है।

हर रोज मां के चरण स्पर्श करो

मुनि श्री ने कहा कि जीवन में दुख, अशांति है। घर का वास्तु ठीक नहीं है, ग्रहों की दशा ठीक नहीं चल रही है तो मां के चरणों का स्पर्श कर लेना और अगर मां नहीं है तो मां के चरण बनाकर घर में रख लेना। सुबह-सुबह उनका स्पर्श कर लेना, सब दुख दूर हो जाएंगे। मां की ममता और वात्सल्य की मूर्ति है। उसके अंदर शारीरिक शक्ति बहुत ज्यादा नहीं होती फिर भी वह दुनिया से लड़ने को तैयार हो जाती है। दुनिया में मां ही एक ऐसी है, जो अपने बच्चे के लिए ही किसी का भी सामना करने के लिए तैयार हो जाती है।

पुण्यशाली व्यक्ति को मिलती है

उन्होंने बताया कि मां भगवान की पूजा, वंदन और ध्यान करती है, तब भी अपने बच्चे के लिए ही मांगती है कि वह सुख-शांति से संसार में रहे। बच्चे की गलती होने पर भी वह दूसरों के सामने तो यही कहेगी कि मेरे बच्चे की गलती नहीं है। वह कभी भी अपने बच्चे को किसी के सामने शर्मिंदा नहीं होने देती। दुनिया में मां का महत्व तो वही बता सकता है जिसे मां का प्यार न मिला हो। जो बचपन से अनाथ रहा हो, जिसने मां के हाथ का भोजन नहीं किया हो, जिसके दुख-दर्द को पूछने वाली मां न हो। मां पुण्यशाली व्यक्ति को मिलती है।

जीने की कला सिखाती है मां

मुनि श्री ने कहा कि बच्चा जब मां के गर्भ में आता है उस दिन से मां दुनिया से, अपनी पसंद- नापसंद से नाता तोड़ लेती है। वह अपना उठने-बैठने तक को सीमित करने के साथ क्या खाना है और क्या नहीं खाना, यह भी बच्चे के अनुसार करती है। अपने आस-पास के दीवार लगे चित्र तक बदल देती, जिससे बच्चे पर बुरा प्रभाव न पड़े। जीने के लिए श्वास, पेट के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, उसी तरह जीवन में मां की आवश्यकता होती है। जीवन में अनुभवों का खजाना मां से ही मिलता है। दुनिया से लड़ने की शक्ति और जीने जी कला मां ही सीखी सकती है। महात्मा, परमात्मा जैसे पर्वत शब्दों के अंत में भी मां ही शब्द आया है। जिसे यह तो पता चलता है कि मां कितनी पवित्र आत्मा है। धन के लिए सरस्वती, धन के लिए लक्ष्मी और शक्ति के लिए दुर्गा की पूजा- आराधना होती है, ये भी सब मां का ही स्वरूप हैं।

स्मृति नगर के लिए हुआ विहार

इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और मंगलाचरण से हुई। पाद प्रक्षालन दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ पंचायत मंदिर अंजनी नगर की कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र सोगानी, उपाध्याय ऋषभ पाटनी, मंत्री संजय मोदी एवं राजेश काला, चंद्रकुमार गोधा, हेमंत गदिया, राजकुमार जैन, नितिन पाटोदी, अंकित जैन और अंशुल जैन ने किया। मंगलाचरण योगेन्द्र पंडित और मंजुला डोसी ने किया। शास्त्र भेंट पिंकी कासलीवाल और मुनि श्री की गृहस्थ जीवन की भतीजी ध्वनि जैन ने किया। धर्म सभा का संचालन समाज के उपाध्यक्ष ऋषभ पाटनी ने किया। आभार नितिन पाटोदी ने व्यक्त किया। सभा में सकल जैन समाज के लोग मौजूद रहे। मदिर कमेटी की ओर से आगामी अष्टानिका महापर्व में विधान के लिए मुनि श्री को श्रीफल भेंट किया गया। उन्होंने अपने सानिध्य के लिए सहमति भी प्रदान की। इसके बाद मुनि श्री का दोपहर में स्मृति नगर के लिए विहार हो गया।

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