विजय नगर के दिगम्बर जैन पंचबालयति पारमार्थिक एवं धार्मिक ट्रस्ट की ओर से आयोजित पांच दिवसीय गुरु आराधना महोत्सव के तीसरे दिन प्रतिष्ठा पितामह पं. गुलाबचन्द्र पुष्प टीकमगढ़ की जन्म शताब्दी मनाई गई। कार्यक्रम में सान्निध्य अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज एवं आशीर्वाद आचार्य श्री विहर्षसागरजी महाराज का रहा। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि पुष्प जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रकाश आज हमें पूजा-विधान के माध्यम से दिखाई देता है। पढ़िए ये विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। विजय नगर के दिगम्बर जैन पंचबालयति पारमार्थिक एवं धार्मिक ट्रस्ट की ओर से आयोजित पांच दिवसीय गुरु आराधना महोत्सव के तीसरे दिन प्रतिष्ठा पितामह पं. गुलाबचन्द्र पुष्प टीकमगढ़ की जन्म शताब्दी मनाई गई। कार्यक्रम में सान्निध्य अंतमुखी मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज एवं आशीर्वाद आचार्य श्री विहर्षसागरजी महाराज का रहा। कार्यक्रम का प्रारम्भ मंगलाचरण, चित्रानावरण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके साथ ही सबसे पहले भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज एवं मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज की पूजा की गई।
इन्हें मिला सौभाग्य
मंगलाचरण करने का सौभाग्य शुभि मारौरा को प्राप्त हुआ। चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन पारसचंद जैन (जज साहब ). डॉ. अरविन्द जैन मंत्री पंचबालयति मंदिर, डॉ. मुकेश जैन विमल, डॉ. बाहुबली शास्त्री, इंजी. अभिषेक जैन ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पारसचंद जैन (जज साहब) ने की। मुख्य अतिथि डॉ. अरविन्द जैन रहे। कार्यक्रम का संचालन ब्र. जिनेश मलैया ने किया और विधि-विधान सुरेश मलैया द्वारा किया गया। कार्यक्रम में पंडित गुलाबचन्द्र पुष्प द्वारा अनेक विद्वानों ओर से की गई विधि-विधान प्रतिष्ठा संबंधी शंकाओं का समाधान आगम के परिप्रेक्ष्य में देने वाली जिज्ञासा समाधान पुस्तक का लोकार्पण किया गया।
प्रतिष्ठा के क्षेत्र में बहुत बड़ा काम
इस अवसर अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागरजी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि पंडित गुलाबचंद्र पुष्प आज हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व, कृतित्व हमारे बीच में है। वह एक अच्छे साधक, प्रतिष्ठाचार्य और वैद्य, संगीतकार के रूप में जाने जाते थे। प्रतिष्ठा के क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ा काम किया और प्रतिष्ठा रत्नाकर ग्रन्थ का सम्पादन करके प्रतिष्ठा के क्षेत्र में एक नई क्रान्ति को जन्म देने काम किया। आज कई पंडित, ब्रह्मचारी उसी के आधार पाषाण की प्रतिमा को परमात्मा बनाने का काम करते हैं। पुष्प जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रकाश आज हमें पूजा-विधान के माध्यम से दिखाई देता है। वह जैन जगत् में एक ऐसे महान व्यक्ति थे, जिन्होंने संयम और त्याग के साथ अपने जीवन को विकास और उन्नति की ओर ले जाने का कार्य किया है। वह अपने आप में एक ऐसे विद्वान थे, जो निर्भीक थे। शास्त्र की बात को वह बिना किसी डर के साथ समाज के बीच में कहते थे।
अनेक उपाधियां थीं प्राप्त
कार्यक्रम में ब्रह्मचारी जिनेश मलैया ने बताया कि पंडित गुलाबचन्द्र पुष्प को अनेक उपाधियां प्राप्त थीं, जिनमें प्रतिष्ठा पितामह, संहिता सूरी, वाणी भूषण, धर्मरत्न, साहित्य रत्न, विद्वत्ररत्न, प्रतिष्ठा रत्न, प्रतिष्ठा तिलक, प्रतिष्ठा दिवाकर, प्रतिष्ठा रत्नाकर, लौह पुरुष, व्याख्या वाचस्पति आदि शामिल हैं।आपने साहित्य के क्षेत्र में अर्चना गीत, प्रतिष्ठा दर्पण, विधान संग्रह, यागमंडल विधान, व्रत वैभव चार भागों में प्रतिष्ठा रत्नाकर, प्रतिष्ठा पराग, पुष्पांजलि अभिनंदन ग्रन्थ का लेखन किया।
200 से अधिक पंचकल्याणक करवाए
आपने 200 से अधिक पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव आचार्य श्री विद्यासागरजी, आचार्य श्री आर्यनन्दीजी, आचार्यश्री शिवसागरजी, आचार्य श्री सन्मतिसागरजी, आचर्य श्री विरागसारजी, आचार्य श्री पुष्पदंतसागरजी, आचार्य श्री विद्यानंदीजी, मुनिश्री सुधासागरजी, मुनि श्री योगसागरजी, मुनिश्री समता सागरजी, मुनि श्री प्रमाणसागरजी सहित कई आचार्यों एवं मुनिराजों के सान्निध्य में कराया। आपके प्रतिष्ठाचार्यत्व में लाखों मूर्तियां प्रतिष्ठित हुईं तथा आहर जी में प्रमाणसागरजी सहित 9 क्षुल्लक दीक्षाएं 9 मई 1985 को तथा 23 दीक्षाएं श्री सिद्धक्षेत्र नेनागिर में 11 आर्यिकाएँ दीक्षाएं एवं 12 क्षुल्लक दीक्षाएं 10 फरवरी 1987 को दी गईं। श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में 31 मार्च 1988 को मुनिश्री प्रमाणसागरजी सहित 8 मुनि दीक्षाएं, नरसिंहपुर में 27 फरवरी 1990 को 6 आर्यिका दीक्षाएं, श्री सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि में 6 मई 1991 को क्षुल्लक सिद्धांतसागरजी सहित 7 दीक्षाएं आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा दी गई। आपके द्वारा पंचबालयति मंदिर इन्दौर, मुरैना, भोपाल, अमरकंटक, टीकमगढ़, बड़ागांव, गाजियाबाद में अनेकों विद्वानों को प्रशिक्षण देकर प्रतिष्ठाचार्य बनाया।













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