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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : समझाया भक्तामर के 18वें काव्य का महत्व


मुनि श्री विहसंतसागर महाराज ने कहा कि हमें कभी भी किसी की पड़ी हुई, रखी हुई वस्तु को नहीं उठाना चाहिए क्योंकि जैन आगम में आचार्य भगवंत ने कहा है कि आचौर्य महाव्रत नाम का व्रत है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


डबरा। चातुर्मासिक धर्मसभा में आरोग्यमय वर्षायोग समिति द्वारा आचार्य विराग सागर जी मुनिराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से किया गया। इसके बाद मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर जी महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की। गुरुदेव ने भक्तामर स्तोत्र के अठारवें काव्य की व्याख्या करते हुए बताया कि इस काव्य में मुनिवर ने कहा कि हे भगवान! हमेशा उदित, मोहांधकर का नाशक, राहु को बादलों को तिरस्कृत करने वाला आपका मुख कमल तीनों लोक के अपूर्व कांति को लिए चंद्र मण्डल सा सुशोभित होता है।

उन्होंने कहा कि हमें कभी भी किसी की पड़ी हुई, रखी हुई वस्तु को नहीं उठाना चाहिए क्योंकि जैन आगम में आचार्य भगवंत ने कहा है कि आचौर्य महाव्रत नाम का व्रत है, जिसका अर्थ यह है कि किसी की वस्तु को बिना पूछे नहीं उठाना चाहिए। यदि हम ऐसा करते है तो हमें चोरी करने का पाप लगता है।

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