जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा प्राकृत भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क कार्यशाला उपलब्ध कराई जा रही है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन न्यूज़ के साथ…
इंदौर:- जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा प्राकृत भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क कार्यशाला उपलब्ध कराई जा रही है। प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने की दृस्टि से प्राकृत भाषा का साहित्य अतयंत उपयोगी रहा है ,भगवान् महावीर स्वामी द्वारा उपदिष्ट जैन आगम साहित्य प्राकृत भाषा की अमूल्य धरोहर है | वैराग्य ,तप, सयम एवं त्याग से ओत प्रोत यह साहित्य आध्यात्मिक सहृदयों को स्वतः ही अपनी और आकृष्ट कर लेता है |अधिकांश जैन ग्रंथो की रचना प्राकृत भाषा में ही हुई है | हमारा मूल महामंत्र णमोकार मंत्र इसी प्राकृत भाषा में है | यह शिलालेखों की भी भाषा रही है | हाथीगुफा शिलालेख, नासिक शिलालेख, अशोक के शिलालेख प्राकृत भाषा में ही हैं |
प्राकृत भाषा जैनो की पहचान है
हमें प्राकृत भाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए ,प्राकृत भाषा जैनो की पहचान है | वर्तमान समय में आवश्यकता है की हमअन्य भाषाओ के साथ साथ प्राकृत भाषा को भी सीखे | एक युग में प्राकृत जन भाषा थी और हमारे आचार्यों ने इसी को आधार बना कर ग्रंथो की रचना की है | इस लोक भाषा ‘प्राकृत’ का समृद्ध साहित्य रहा है, जिसके अध्ययन के बिना भारतीय समाज एवं संस्कृति का अध्ययन अपूर्ण रहता है। सभी इच्छुक विद्यार्थी संस्था के उदासीन आश्रम स्थित कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं।
कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क उपलब्ध
जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। प्राकृत भाषा का यह पाठ्यक्रम श्रवणबेलगोला विश्वविद्यालय से संबद्ध होंगा। जिसमे नियमित उपस्थिति एवं विशेष अंक प्राप्त करने वाले प्रशिक्षणार्थियों को स्वर्गीय डॉ अजीत कुमार सिंह कासलीवाल स्मृति प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत प्रमाण पत्र एवं प्रोत्साहन राशि भी सम्मान स्वरूप दी जाएगी।
कुंदकुंद ज्ञानपीठ के अध्यक्ष अमित कासलीवाल एवं समाज के संजीव जैन संजीवनी ने बताया कि प्राकृत भाषा के अध्यापन करवाने हेतु संस्कृत विदुषी प्रोफेसर श्रीमती डॉक्टर संगीता मेहता ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है एवं नियमित उपस्थिति एवं विशेष अंक प्राप्त करने वाले प्रशिक्षणार्थियों को स्वर्गीय डॉ अजीत कुमार सिंह कासलीवाल स्मृति प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत प्रमाण पत्र एवं प्रोत्साहन राशि भी सम्मान स्वरूप दी जाएगी।
कुंदकुंद ज्ञानपीठ
जैन साहित्य अत्यंत समृद्ध है, किन्तु वैज्ञानिक अभिरुचि सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा अब तक उसका सम्यक अनुशीलन नहीं हुआ है । साथ ही देश के कोने – कोने में विकीर्ण पुरासम्पदा का संरक्षण, अभिलेखीकरण एवं मूल्यांकन किये जाने की तत्काल आवश्यकता है । इन दूरगामी लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की स्थापना दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के अन्तर्गत 19.10.87 को की गयी एवं इसकी सभी प्रवृत्तियाँ एतदर्थ समर्पित हैं ।













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