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आर्यिका विभाश्री माताजी के चातुर्मासिक प्रवचन : प्रत्येक जीव के अपनी-अपनी कषायों के कारण अनन्त प्रकार के परिणाम


वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक जीव के अपनी-अपनी कषायों के कारण अनन्त प्रकार के परिणाम हो सकते हैं। कृष्ण लेश्या के परिणाम वाले जीव का सुधार नहीं हो सकता है, बल्कि नील लेश्या के परिणाम वाला जीव सुधर सकता है। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…


रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक जीव के अपनी – अपनी कषायों के कारण अनन्त प्रकार के परिणाम हो सकते हैं। कृष्ण लेश्या के परिणाम वाले जीव का सुधार नहीं हो सकता है, बल्कि नील लेश्या के परिणाम वाला जीव सुधर सकता है। नील लेश्या के परिणाम वाला जीव आलसी एवं मंदबुद्धि वाला होता है। आलसी व्यक्ति को कोई काम करने की इच्छा नहीं होती वो व्यक्ति शरीर से ही नहीं बल्कि मन से भी आलसी होते हैं। मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। आलस्य कई बीमारियों को जन्म देती है, इसलिए जीवन में श्रम का महत्व है।

सेवा धर्म को अपनाएं

सेवा करने से अपनत्व का भाव बढ़ता है। लोगों को शांति मिलती है। इसलिए सेवा धर्म को अपनाना चाहिए। पारिवारिक सौहार्द और प्रेम के लिए एक-दूसरे को सहन करना चाहिए। कहा भी गया है कि जो सहता है वह रहता है। सहन करने वाला ही महान बनता है। मिट्टी कुम्हार की चोटों को सहन करती है तब सुंदर घड़े का निर्माण होता है। आलसी आदमी सबसे ज्यादा बहाने बनाते है । आलसी व्यक्ति कभी धर्म नही कर सकता।

माता पिता के संस्कारों का बच्चो पर बहुत प्रभाव पड़ता है पहले बच्चे घरों में खेलते थे, दौड़ते भागते थे परन्तु आज कल बच्चे बैठे – बैठे मोबाइल पर खेलते रहते हैं और आलसी हो जाते हैं। पहले शरीर में सर्दी , गर्मी और बरसात को सहन करने की क्षमता हुआ करती थी आज कल दिन भर एसी में रहते रहते , सुख सुविधाओं में रहते-रहते शरीर को इतना कमजोर बना दिया कि शरीर में छोटी सी उम्र में ही बड़ी-बड़ी बीमारियाँ देखने में आती है यदि हम अपने शरीर से मेहनत नहीं करेंगे तो हमारे शरीर के सभी अंग काम करना बंद कर देंगे। *बहुत निद्रालु हो, परवंचना में दक्ष हो, अतिलोभी हो, आहारादि संज्ञाओं में आसक्ति आदि नील लेश्या वाले व्यक्ति के लक्षण हैं।

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Shreephal Jain News

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