अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बारह भावना प्रवचन श्रृंखला में 12वें दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर आपको मनुष्य पर्याय में शरीर मिला है, उसमें भी जैन कुल मिला है तो इसका बुद्धि से उपयोग करो। इसे धर्म, दान, पूजा, अभिषेक, साधु सेवा, प्रभु भक्ति आदि में लगाओ तभी बोधि की प्राप्ति होगी। भगवान की प्रतिमा कर्म निर्जरा में हमारे लिए केवल निमित्त है। पढ़िए सारांश जैन और भव्य जैन की विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में बारह भावना प्रवचन श्रृंखला के 12वें दिन बोधि दुर्लभ भावना पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि शरीर आदि सब मिलना तो सहज है लेकिन सबसे दुर्लभ है बोधि की प्राप्ति। प्राचीन आचार्यों ने शास्त्रों में कहा कि हां की निगोद से स्थवार, स्थावर से त्रस, त्रस से नर पर्याय मिलती क्योंकि देवता भी मनुष्य बनने को तरसते हैं। मनुष्य पर्याय में उत्तम देश, कुल, सुगति, श्रावक कुल, सम्यक दर्शन, संयम, व्रत की पालना, शुद्ध भाव और अंत में बोधि की प्राप्ति होना सर्वाधिक कठिन है।
धर्म करने से होगी बुद्धि की प्राप्ति
मुनि श्री ने कहा कि अगर आपको मनुष्य पर्याय में शरीर मिला है, उसमें भी जैन कुल मिला है तो इसका बुद्धि से उपयोग करो। इसे धर्म, दान, पूजा, अभिषेक, साधु सेवा, प्रभु भक्ति आदि में लगाओ तभी बोधि की प्राप्ति होगी। भगवान की प्रतिमा कर्म निर्जरा में हमारे लिए केवल निमित्त है। इसलिए हमारी बुद्धि में यह भी होना चाहिए कि भगवान न तो लेते हैं, न देते हैं, न देखते हैं, न सुनते हैं, न बोलते हैं।
वह तो हमें बस प्रेरणा देते हैं कि संसार दुख का कारण है। इसे छोड़ो। यह बुद्धि हमें बोधि की प्राप्ति करा देती है। बोधि दुर्लभ भावना का चिंतन करते हुए बार- बार यह सोचना चाहिए कि दुख का नाश हो, कर्म का नाश और बोधि की प्राप्ति हो। आपमें जो गुण है, वह मुझे प्राप्त हो। यही प्रार्थना, यही भावना पूरी कर दो। मेरा अंतिम मरण, समाधि मरण तेरे दर पर हो।
अपने उत्तम कुल को पहचानें
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि हमें इतनी दुर्लभ मनुष्य पर्याय मिली है, उसे क्यों व्यर्थ गंवा रहे हो। एक किसान को खेत में एक चमकता पत्थर मिला। उसने उसे हाथ पर बांध लिया। एक दिन उससे एक जौहरी ने पूछा कि यह पत्थर कितने में दोगे। उस किसान ने कहा कि 100 रुपए में। जौहरी ने कहा कि 50 में दे दो। किसान ने नहीं दिया। आगे जाकर एक जौहरी और मिला। उसने भी पूछा कि कितने में दोगे। किसान बोला कि 1000 रुपए में दूंगा। दूसरे जौहरी ने उसे खरीद लिया।
पहले वाला जौहरी वापस आया और कहा कि वह पत्थर कहां है। किसान ने कहा कि वह तो उसने 1000 रुपए में बेच दिया तो वह जौहरी बोला, मूर्ख वह तो लाखों का था तो किसान में कहा, मूर्ख मैं नहीं, तुम हो। तुम्हें तो 100 रुपए भी अधिक लग रहे थे। बस इसी प्रकार हम भी मनुष्य पर्याय में अपने उत्तम कुल आदि को पहचान नहीं पा रहे और व्यर्थ में इसे भोगों में लगाकर बुद्धि खराब कर रहे हैं। धर्म सभा में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज जी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन ब्र. अजय भैया ने किया।













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